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Saturday, June 2, 2012

टेक्निकल फॉल्ट

                               

                   जून की चिप-चिपी रात..और बत्ती गुल..बाप रे बाप..! वो तो भला हो इनवर्टर का..वरना ये गर्मी और उमस तो जान ही ले लेती..। पर ये भी बेचारा कब तक चलेगा..। बिजली देर तक न आई, तो ये न हो..कि कहीं नींद गहराने के साथ..ये भी सोने लगे..!..सो इसे ज़रा बचा कर इस्तेमाल कर रही हूं..। हम दोनों बाहर चले आए हैं..मैं और मेरा लैप-टॉप..। हमारी तरह और भी लोग हैं..जो इन्वर्टर की बैटरी बचाने के चक्कर में, गली में टहल रहे हैं..। सामने वाली आंटी, अपनी चौखट पर, जाली वाले दरवाज़े से झांक रही हैं.., ऊपर के फ्लोर वाले अंकल, बालकनी में आ जमे हैं..। पास के पीजी की लड़कियां..अपने-अपने फोन समेत..बाहर निकल आई हैं सब की सब..। उनमें से दो-तीन फोन पर चिपकी हैं..। उन्हें गर्मी-वर्मी का एहसास नहीं हो रहा है..बिज़ी हैं कॉल पर..। आस-पास के बच्चों की धमा चौकड़ी भी चालू है..। उनकी आवाज़ें अच्छी लग रही हैं कानों को..। अपना बचपन याद आता है..। हमारे छोटे से शहर में भी जब लाइट चली जाती थी, हम बच्चे..बड़ा खुश होते थे..। गली में खेलने के लिये एक्स्ट्रा टाइम जो मिल जाता था..! अब न वैसी गलियां रहीं..न वो बेफिक्रियां..। अब लाइट चली जाए..तो गर्मी से ज़्यादा, गर्मी का ख्याल होश उड़ा देता है..। वैसे भी दिल्ली के पॉश इलाकों में गलियां, गलियों जैसी कहां होती हैं..। बंद कमरों के ढेर होते हैं यहां..। ए.सी. की ठंडक, मोहल्ले के रिश्तों की गर्माहट को पनपने नहीं देती..। बत्ती चली भी जाए, तो इन्वर्टर घर में बांधे रखता है..। यहां तो टेक्निकन फॉल्ट हुआ दिखता है, लोगों को अंदाज़ा है, कि लाइट देर तक नहीं आने वाली, सो बाहर निकल आए हैं..। वरना..दिल्ली की गलियों में ऐसी चहल पहल देखने को कहां मिलती है भला..। मेरी यहां कुछ खास जान पहचान नहीं है..। एक दो सहेलियां हैं, वो दिल्ली से बाहर गई हुई हैं..। सो मैं..इस लैप-टॉप के सहारे हूं..। तब तक...जब तक इसकी बैट्री खत्म न हो जाए..। लाइट तकरीबन 2 घन्टों से नहीं है..। कुछ इलेट्रीशियन चढ़े हैं ट्रांसफार्मर पर..। दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं..। लगता है ओवरलोडिंग से गड़बड़ हुई है..। जब लाइट गई थी, ज़ोर का धमाका हुआ था..। अभी न जाने कितना वक्त और लगने वाला है..। गर्मी बेचैन कर रही है..। अपने घर पर होती, तो मम्मा-पापा-भाई के साथ गप्पें लगा रही होती..। गर्मी की रात को, खाना खाने के बाद पापा आइस्क्रीम खिलाते हैं..। काश..वहीं होती..पापा के पास..। ज़्यादा देर बाहर भी नहीं बैठ सकती यहां तो..। लोग एक-एक करके अंदर जाने लगे हैं..। वापस..इन्वर्टर बाबा की शरण में..! थोड़ी सी देर के मेरे शहर का सा माहौल बन गया था.., अब ये गली, वापस दिल्ली की गली बनने जा रही है..। बंद कमरों की गठरी सी..।.....ह्ह्ह्ह्....।मैं भी चलूं भीतर..पता नहीं लाइट कब आएगी.....

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