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Wednesday, April 27, 2011

चुप्पी का शोर....

                     सूजी हुई बांह, आंख के नीचे खून जमने से काला निशान, चोट खाया चेहरा..और घायल आत्मा..।          
                    -तुम्हारे साथ क्या हुआ सरिता..?
                    इस सवाल के जवाब में सरिता देर तक बोलती रही। पर एक शब्द..जो लाख कोशिश के बावजूद..उसकी ज़ुबान से नहीं निकल पा रहा था.., वो था, बलात्कार ।
                    पति के हाथों.., घर के भीतर बलात्कार..।
                   सरिता से आपकी पहचान पहले भी करा चुकी हूं..। अगर अपनी आंखों से उसकी ये हालत न देखी होती, तो शायद इस विषय पर लिखने का साहस नहीं जुटा पाती..।
                  ' दीदी..वो मेरे को मारा..। गाली बका । पड़ोसी से पांच सौ उधार लेके पी के आया था दीदी । नशे में पेचकस मेरी छाती में मार दिया । मैं बेहोश हो गया दीदी..मुंह से बहुत खून आता था..। '
                    सरिता की बातें सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे ।
                    ' दीदी ...', सरिता ने हाथ से इशारा किया...,  'मेरे को इधर काटा...। मैं उसको बोला.., मेरे को छोड़ दे..पर वो नई छोड़ा दीदी'..।
                    आंख में आते आंसू को उसने वहीं रोक लिया..। कुछ देर शांत बैठी रही, फिर चुप-चाप उठ कर काम करने लगी..। दो दिन बाद काम पर लौटी थी..। चोट खाई तो थी ही, कमज़ोर भी लग रही थी। मेरे पूछने पर बोली..कि तीन दिनों से खाना भी नहीं खा पारही है। पति ने चेहरे पर इतने ज़ोर से मारा है, कि खाना खाने में भी तकलीफ हो रही है।
- तो तुम पुलिस में शिकायत क्यों नहीं करतीं सरिता? कम से कम अपने घर वालों को तो खबर करो..!
' नई दीदी, मेरा भाई बहुत हट्टा-कट्टा है। श्याम उसका मुकाबला नहीं कर पाएगा। मैं उसको धोखा नई दे सकता दीदी। शिकायत करूंगा..तो मेरा भाई उसको मार देगा '
                    ये जवाब सुनना मेरे लिये अनपेक्षित नहीं था । भारत में ऐसे मामलों की शिकार निन्यानवे प्रतिशत महिलाएं,  ऐसे ही उत्तर दिया करती हैं ।
                    ये भारतीय सभ्यता की सुन्दरता है कि, औरत को बचपन से सहनशीलता, और क्षमाशीलता का पाठ पढ़ाया जाता है। पर क्या ये विडम्बना नहीं है कि, पुरुष, महिला के इस संस्कार को, अपनी मनमर्ज़ी का लाइसेंस बना लेता है..?              
                    ऐसे लोगों को पाठ पढ़ाने के लिये कानून है। पर किसी काम के नहीं। दहेज के खिलाफ तो अब महिलाएं खुल कर बोलने लगीं हैं..। मगर पति के हाथों ज़बरदस्ती की शिकार महिलाएं, अक्सर शर्म के कारण, या फिर पत्नी धर्म निभाने के लिये, चुप रह जाती हैं ..। कुछ कहें भी, तो उनकी बात कौन समझेगा?परिवार तो साथ देने से रहा..। और पुलिस के पास जा कर अगर इंसाफ मिल भी गया, तो समाज और परिवार की नाराज़गी झेलनी होगी..।
                    मैं जानती हूं, कि ये पन्ना पढ़ने वाले बहुत से लोगों को इस विषय पर ऐतराज़ होगा । पर फिर भी, मैं अपनी बात कहूंगी ज़रूर..। क्योंकि मुझे यकीन है कि, सभ्य समाज के पढ़े-लिखे समझदार लोग, इस विषय की संवेदनशीलता को भी समझते हैं, सरिता जैसी महिलाओं की पीड़ा और उनकी चु्प्पी का शोर भी सुन सकते हैं..। शायद मेरी आवाज़ में ज़्यादा ताकत ना हो..। विरोध का एक मद्धम सा स्वर ही सही, उन लोगों तक पहुंचेगा ज़रूर, जिनके घर की चार दीवारी, घर की लक्ष्मी की दर्द भरी चीखों से सहमी रहती है..।

Sunday, April 17, 2011

प्रोग्राम मस्त, टीआरपी ज़बरदस्त

                         'तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त....तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त....'- टीवी पर गाना चल रहा है । एक अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल है..नाम नहीं लूंगी । प्रोग्राम है नब्बे के दशक के हिट गानों पर । और भी कई गानों की बात हो रही है..मगर इस गाने को बिना काटे..पूरा दिखाया गया । अगला गाना-  'जोरा जोरी चने के खेत में..'। ये गाना भी पूरा चला है ।... अब कोई प्रोग्राम देखे .. ना देखे.., गाना तो देख ही लेगा !  
                        टीआरपी का सवाल है भाई, क्या करें..मजबूरी ठहरी.. ! बेचारे प्रोड्यूसर से जवाब मांगा जाता है । न्यूज़ चैनलों पर जो कॉन्टेंट ऑन एयर होता है.., उस पर सेंसर नहीं होता । छोटी थी.., तो पापा कहते थे- बेटा न्यूज़ चैनल देखे करो । अब मैं खुद न्यूज़ चैनल में काम करती हूं । पर मुझे यकीन नहीं, कि मैं अपने बच्चों से ये बात , उसी आत्मविश्वास से कह पाऊंगी । 
                        मनोरंजन चैनलों से कहीं ज़्यादा ड्रामा न्यूज़ चैनलों की स्क्रीन पर, और, स्क्रीन के पीछे होता है ।
                    आप सोच रहे होंगे..आज मुझे हो क्या गया है, न्यूज़ चैनलों को क्यों कोस रही हूं..। सच बताइयेगा..आप भी कभी कभार ऐसा करते हैं..हैं ना..?!?!  आप ऐसा उस वक्त करते हैं..जब "ऐसी" किसी खबर(?) के दौरान..अचानक बहन या मां कमरे में आ जाते हैं । या फिर ... अपराध की वीभत्स कल्पनाओं से भरे किसी शो के वक्त..आपका बेटा पूछ बैठता है- पापा..ये बलाक्तार क्या होता है..? 
                   पिछले दिनों एक खबर टीवी पर खूब छाई रही..अन्ना हज़ारे का अनशन । बड़ी संख्या में लोगों ने अन्ना को समर्थन दिया । खूब भावुक हो कर टीवी चैनलों ने कई घन्टों तक लाइव दिखाया । बाद में एक न्यूज़ चैनल की एंकर..किसी से बतियाती मिली- 'अरे..ऐसे मौके तो हमारे लिये फेस्टिवल होते हैं फेस्टिवल । ब़डा मज़ा आता है यार । पूरा पूरा दिन हम लाइव रहते हैं । वरना नॉर्मल दिनों में कहां इतने बुलेटिन मिलते हैं करने को..'। जन लोकपाल बिल से देश का भला हो ना हो.., अन्ना के अनशन से..उन मोहतरमा का तो भला ज़रूर हुआ..। बेशक..टीवी चैनलों का भी हुआ । कम से कम, कुछ घन्टों के लिये ही सही, सारे न्यूज़ चैनलों पर, सिर्फ और सिर्फ, देश की बात हो रही थी..देश के भले की बात हो रही थी..।