' मुझे चार साल हो गए वहां काम करते ...एक पैसा सैलरी नहीं बढ़ी..क्योॆकि मैं जैन्ट्स क्लाइंट्स का काम करने को तैयार नहीं थी..' - मेरे हाथ पर मेहंदी लगाते हुए शिवानी बोले जा रही थी - ' आप ही बताओ दीदी..पार्लर में किसी लड़की का काम पसंद आने पर आप कितनी टिप दोगी उसे ? पचास रुपए? ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपए ? है ना?
हां - मैंने कहा
'तो फिर आप ही बताओ, कि ये जैन्ट्स क्लाइन्ट, 500-1000 रुपए के नोट किस लिये निकालते हैं ? आखिरकार..नौकरी छोड़नी पड़ी उसे..। उसका दिल भड़ास से भरा पड़ा था । शिवानी दो महीने के अपने बच्चे को घर पर छोड़ कर काम पर जाती है..ताकि उसके पति को घर का चलाने का बोझ अकेले ना उठाना पड़े । मज़बूत इरादों वाली लड़की है, लेकिन समाज कि तंगदिली उसे चिढ़ा देती है, तो वो लड़ बैठती है किसी ना किसी से ..। कभी अपने आप से..कभी हालात से ..।
' भाभी जी..आपके यहां काली आई है क्या ? ' पड़ोस वाली आंटी ने मां को आवाज़ दी तो मेरा ध्यान टूटा ..। काली हमारे और उनके यहां काम करती है..। दस पंद्रह दिनों से छुट्टी पर थी..। उस दिन भी नहीं आई थी..। बीमार तो नहीं ? मेरे मन में सवाल कौंधा । ' अरे नहीं ' - आंटी ने जवाब दिया - ' इन लोगों का रोज़ का रोना है । गई होगी बच्चा गिराने..'।
काली - सुदृढ़, छरहरी, सांवली देह। दौड़-दौड़ कर घरों का काम करती है। प्रौढ़ हो चली है..पर जैसे उम्र तो उसे छूती भी नहीं ! छूता है..तो केवल दुर्भाग्य। पति नाकारा है..शराबी है..। साथ रहता भी नहीं। कभी कभार अचानक आ धमकता है..काली की कमाई छीनने ..उसकी देह नोचने..। फिर भी जैसे तैसे दो बेटों को पढ़ा लिखा कर इस लायक बना लिया है काली ने, कि वे शादी करके अपना घर चला सकें ..। सारी ज़िन्दगी अकेले काट दी इन्हीं बच्चों की खातिर..। ऐसा नहीं है कि कोई मिला नहीं उसे ..। एक दिन भावुक हो कर बताया था उसने मुझे..। उसकी रिश्तेदारी में है एक शख्स..जिसे वो पसंद करती है। वो भी काली से शादी करना चाहता है..। मगर काली चुप है..। क्योंकि उसके जवान होते बच्चों को इसमें अपनी बेइज़्ज़ती महसूस होती है..। वे चाहते हैं कि उनकी मां, जैसे अब तक जीती आई है..वैसे ही जीती रहे..। काली उन्हें ये समझा पाने में सक्षम नहीं है..कि उसने अपनी ज़िम्मेदारियां निभा दी हैं..अब वो अपनी जिन्दगी अपने लिये जीना चाहती है..। सो..मन मार कर रोज़ लोगों के घरों में बर्तन घिसती है..और हाथों की लकीरें भी..। पर घिसने से ये लकीरें बदलने वाली तो नहीं !
ललिता भी लड़ रही है अपनी लकीरों से..। शराबी पति जब तक पति जीवित था..उसकी मार पीट-गाली गलौच सहन करती रही..। और अब ..अपने ही परिवार के दबाव में है..जो उसे नई ज़िन्दगी शुरू नहीं करने देना चाहता..। ललिता के दोबारा शादी करने के फैसले पर उसकी अपनी मां..और भाई शर्मिन्दा हैं, पता नहीं क्यों !
ललिता ने अब अपना जीवन साथी खुद चुना है,,। उसका आठ साल का बेटा जानता है कि वो अंकल उसके पापा बनने वाले हैं..। वो खुश है। पर ललिता अब परिवार से बहिष्कृत है..। ससुराल तो अपना था ही नहीं, अब मायके से भी उसे न्योता नहीं आता ..। एक पारिवारिक समारोह में मेरी उससे मुलाकात हुई थी..। बहुत उदास थी तब वो..।
' क्या मैं कुछ गलत कर रही हूं ? ' उसका सवाल बार बार मेरे कानों में गूंजता है..।
क्या आत्मसम्मान से जीने की शिवानी की चाह गलत है ? काली को क्या हक़ नहीं है अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने का ? ललिता को क्यों उसके परिवार का बहिष्कार सहन करना पड़ रहा है ? परिवर्तन के मुखौटे के पीछे, क्या अब भी वही पुराना समाज है ?
शिवानी, काली और ललिता ..तीनों अपने हालात और समाज से लड़ रही हैं..। मैं इस लड़ाई में इनके साथ हूं..। और आप ?

हां - मैंने कहा
'तो फिर आप ही बताओ, कि ये जैन्ट्स क्लाइन्ट, 500-1000 रुपए के नोट किस लिये निकालते हैं ? आखिरकार..नौकरी छोड़नी पड़ी उसे..। उसका दिल भड़ास से भरा पड़ा था । शिवानी दो महीने के अपने बच्चे को घर पर छोड़ कर काम पर जाती है..ताकि उसके पति को घर का चलाने का बोझ अकेले ना उठाना पड़े । मज़बूत इरादों वाली लड़की है, लेकिन समाज कि तंगदिली उसे चिढ़ा देती है, तो वो लड़ बैठती है किसी ना किसी से ..। कभी अपने आप से..कभी हालात से ..।
' भाभी जी..आपके यहां काली आई है क्या ? ' पड़ोस वाली आंटी ने मां को आवाज़ दी तो मेरा ध्यान टूटा ..। काली हमारे और उनके यहां काम करती है..। दस पंद्रह दिनों से छुट्टी पर थी..। उस दिन भी नहीं आई थी..। बीमार तो नहीं ? मेरे मन में सवाल कौंधा । ' अरे नहीं ' - आंटी ने जवाब दिया - ' इन लोगों का रोज़ का रोना है । गई होगी बच्चा गिराने..'।
काली - सुदृढ़, छरहरी, सांवली देह। दौड़-दौड़ कर घरों का काम करती है। प्रौढ़ हो चली है..पर जैसे उम्र तो उसे छूती भी नहीं ! छूता है..तो केवल दुर्भाग्य। पति नाकारा है..शराबी है..। साथ रहता भी नहीं। कभी कभार अचानक आ धमकता है..काली की कमाई छीनने ..उसकी देह नोचने..। फिर भी जैसे तैसे दो बेटों को पढ़ा लिखा कर इस लायक बना लिया है काली ने, कि वे शादी करके अपना घर चला सकें ..। सारी ज़िन्दगी अकेले काट दी इन्हीं बच्चों की खातिर..। ऐसा नहीं है कि कोई मिला नहीं उसे ..। एक दिन भावुक हो कर बताया था उसने मुझे..। उसकी रिश्तेदारी में है एक शख्स..जिसे वो पसंद करती है। वो भी काली से शादी करना चाहता है..। मगर काली चुप है..। क्योंकि उसके जवान होते बच्चों को इसमें अपनी बेइज़्ज़ती महसूस होती है..। वे चाहते हैं कि उनकी मां, जैसे अब तक जीती आई है..वैसे ही जीती रहे..। काली उन्हें ये समझा पाने में सक्षम नहीं है..कि उसने अपनी ज़िम्मेदारियां निभा दी हैं..अब वो अपनी जिन्दगी अपने लिये जीना चाहती है..। सो..मन मार कर रोज़ लोगों के घरों में बर्तन घिसती है..और हाथों की लकीरें भी..। पर घिसने से ये लकीरें बदलने वाली तो नहीं !
ललिता भी लड़ रही है अपनी लकीरों से..। शराबी पति जब तक पति जीवित था..उसकी मार पीट-गाली गलौच सहन करती रही..। और अब ..अपने ही परिवार के दबाव में है..जो उसे नई ज़िन्दगी शुरू नहीं करने देना चाहता..। ललिता के दोबारा शादी करने के फैसले पर उसकी अपनी मां..और भाई शर्मिन्दा हैं, पता नहीं क्यों !
ललिता ने अब अपना जीवन साथी खुद चुना है,,। उसका आठ साल का बेटा जानता है कि वो अंकल उसके पापा बनने वाले हैं..। वो खुश है। पर ललिता अब परिवार से बहिष्कृत है..। ससुराल तो अपना था ही नहीं, अब मायके से भी उसे न्योता नहीं आता ..। एक पारिवारिक समारोह में मेरी उससे मुलाकात हुई थी..। बहुत उदास थी तब वो..।
' क्या मैं कुछ गलत कर रही हूं ? ' उसका सवाल बार बार मेरे कानों में गूंजता है..।
क्या आत्मसम्मान से जीने की शिवानी की चाह गलत है ? काली को क्या हक़ नहीं है अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने का ? ललिता को क्यों उसके परिवार का बहिष्कार सहन करना पड़ रहा है ? परिवर्तन के मुखौटे के पीछे, क्या अब भी वही पुराना समाज है ?
शिवानी, काली और ललिता ..तीनों अपने हालात और समाज से लड़ रही हैं..। मैं इस लड़ाई में इनके साथ हूं..। और आप ?


