Popular Posts

Tuesday, October 14, 2014

अभी परिवर्तन हुआ नहीं है ..

                ' मुझे चार साल हो गए वहां काम करते ...एक पैसा सैलरी नहीं बढ़ी..क्योॆकि मैं जैन्ट्स क्लाइंट्स का काम करने को तैयार नहीं थी..' - मेरे हाथ पर मेहंदी लगाते हुए शिवानी बोले जा रही थी - ' आप ही बताओ दीदी..पार्लर में किसी लड़की का काम पसंद आने पर आप कितनी टिप दोगी उसे ? पचास रुपए? ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपए ? है ना?
                  हां - मैंने कहा
                 'तो फिर आप ही बताओ, कि ये जैन्ट्स क्लाइन्ट, 500-1000 रुपए के नोट किस लिये निकालते हैं ?                  आखिरकार..नौकरी छोड़नी पड़ी उसे..। उसका दिल भड़ास से भरा पड़ा था । शिवानी दो महीने के अपने बच्चे को घर पर छोड़ कर काम पर जाती है..ताकि उसके पति को घर का चलाने का बोझ अकेले ना उठाना पड़े । मज़बूत इरादों वाली लड़की है, लेकिन समाज कि तंगदिली उसे चिढ़ा देती है, तो वो लड़ बैठती है किसी ना किसी से ..। कभी अपने आप से..कभी हालात से ..।
                 ' भाभी जी..आपके यहां काली आई है क्या ? ' पड़ोस वाली आंटी ने मां को आवाज़ दी तो मेरा ध्यान टूटा ..। काली हमारे और उनके यहां काम करती है..। दस पंद्रह दिनों से छुट्टी पर थी..। उस दिन भी नहीं आई थी..। बीमार तो नहीं ? मेरे मन में सवाल कौंधा । ' अरे नहीं ' - आंटी ने जवाब दिया - ' इन लोगों का रोज़ का रोना है । गई होगी बच्चा गिराने..'।
               काली - सुदृढ़, छरहरी, सांवली देह। दौड़-दौड़ कर घरों का काम करती है। प्रौढ़ हो चली है..पर जैसे उम्र तो उसे छूती भी नहीं ! छूता है..तो केवल दुर्भाग्य। पति नाकारा है..शराबी है..। साथ रहता भी नहीं। कभी कभार अचानक आ धमकता है..काली की कमाई छीनने ..उसकी देह नोचने..।  फिर भी जैसे तैसे दो बेटों को पढ़ा लिखा कर इस लायक बना लिया है काली ने, कि वे शादी करके अपना घर चला सकें ..। सारी ज़िन्दगी अकेले काट दी इन्हीं बच्चों की खातिर..। ऐसा नहीं है कि कोई मिला नहीं उसे ..। एक दिन भावुक हो कर बताया था उसने मुझे..। उसकी रिश्तेदारी में है एक शख्स..जिसे वो पसंद करती है। वो भी काली से शादी करना चाहता है..। मगर काली चुप है..। क्योंकि उसके जवान होते बच्चों को इसमें अपनी बेइज़्ज़ती महसूस होती है..। वे चाहते हैं कि उनकी मां, जैसे अब तक जीती आई है..वैसे ही जीती रहे..। काली उन्हें ये समझा पाने में सक्षम नहीं है..कि उसने अपनी ज़िम्मेदारियां निभा दी हैं..अब वो अपनी जिन्दगी अपने लिये जीना चाहती है..। सो..मन मार कर रोज़ लोगों के घरों में बर्तन घिसती है..और हाथों की लकीरें भी..। पर घिसने से ये लकीरें बदलने वाली तो नहीं !
                ललिता भी लड़ रही है अपनी लकीरों से..। शराबी पति जब तक पति जीवित था..उसकी मार पीट-गाली गलौच सहन करती रही..। और अब ..अपने ही परिवार के दबाव में है..जो उसे नई ज़िन्दगी शुरू नहीं करने देना चाहता..। ललिता के दोबारा शादी करने के फैसले पर उसकी अपनी मां..और भाई शर्मिन्दा हैं, पता नहीं क्यों !
                ललिता ने अब अपना जीवन साथी खुद चुना है,,। उसका आठ साल का बेटा जानता है कि वो अंकल उसके पापा बनने वाले हैं..। वो खुश है। पर ललिता अब परिवार से बहिष्कृत है..। ससुराल तो अपना था ही नहीं, अब मायके से भी उसे न्योता नहीं आता ..। एक पारिवारिक समारोह में मेरी उससे मुलाकात हुई थी..। बहुत उदास थी तब वो..।
                ' क्या मैं कुछ गलत कर रही हूं ? ' उसका सवाल बार बार मेरे कानों में गूंजता है..।
                 क्या आत्मसम्मान से जीने की शिवानी की चाह गलत है ? काली को क्या हक़ नहीं है अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने का ? ललिता को क्यों उसके परिवार का बहिष्कार सहन करना पड़ रहा है ? परिवर्तन के मुखौटे के पीछे, क्या अब भी वही पुराना समाज है ?
                 शिवानी, काली और ललिता ..तीनों अपने हालात और समाज से लड़ रही हैं..। मैं इस लड़ाई में इनके साथ हूं..। और आप ?
             
                            

                 

               
                 
             
                                

Wednesday, June 13, 2012

कल विदेशी रेटिंग एजेंसी ने चेतावनी दी, आज देसी उद्योगपति भड़के


       गर्मा-गरम राजमा चावल..और उसके बाद फ्रिज से निकाल कर ठंडे मीठे आम ..और खरबूज़े का लुत्फ़..। गर्मियों में छुट्टी के दिन बढ़िया लंच मिल जाए..तो क्या बात है..। वरना हम पत्रकारों को कहां इतनी फुर्सत मिलती है..। ब-मुश्किल एक-आध दिन ऑफ मिले भी..तो अरसे से जमा होते आरहे छोटे-मोटे काम निपटाने में दिन निकल जाता है..। गैस सिलेन्डर खाली होने वाला है, उसका भी इंतज़ाम करना था..।
'भैया जी.., कितने रुपए दूं ? '- मैंने पूछा।
'300 रुपए मैम'- गैस वाले ने कहा..
'अरे ये छोटा सिलेंडर है..पौने चार किलो का'- बीच में मेरी कामवाली बाई बोली..- 'बड़ा तो और महंगा है दीदी। पता नहीं सरकार क्या चाहती है...' ।
आम आदमी के इस सीधे स्पष्ट सवाल का जवाब नहीं है सरकार के पास..। विप्रो के अज़ीम प्रेमजी कहते हैं -'देश बिना नेताओं के चल रहा है..।' इनफोसिस के नारायणमूर्ति ने देश की खराब होती छवि पर चिंता ज़ाहिर की है..। देश के नामी उद्योगपतियों का इस तरह सरकार पर भड़कना, चिंता की बात तो है..।

                                        http://media2.intoday.in/aajtak/images/stories/062012/azeem-premji_325_061312115106.jpg
                                        http://www.thepunjabkesari.com/admincontrol/all_multimedia/2012_6image_12_46_304367555n-ll.jpg

        लेकिन सरकार इस पर कुछ खास तवज्जो नहीं देती..। मणिशंकर अय्यर ज़रूर पलटवार करते हैं, और कहते हैं कि..अच्छे आर्थिक विकास के दिनों में यही उद्योगपति, सरकार का गुणगान किया करते थे..। विपक्ष की ओर से भी एक ही टिप्पणी आती है, वो भी पत्रकारों के सवाल करने पर..। अरे भाई..देश के लिये न सही, राजनीति के लिये ही सही, इस पर विपक्ष, सरकार का घेराव कर ही सकता था..। लेकिन नहीं..., घिसी पिटी लाइन कह कर शाहनवाज़ हुसैन साहब चलते बने..' सरकार आर्थिक मंदी से जूझ नहीं पा रही है'..। अरे तो विपक्ष क्यों सोया पड़ा है भाई..!!, सरकार को झकझोरता क्यों नहीं..? सच्चाई तो ये है..कि आर्थिक मंदी से कम, ये देश राजनैतिक मंदी से ज़्यादा जूझ रहा है..। शरद यादव के पास पत्रकार पहुंचे..तो वो बोले..कि ' कोई भी अर्थशास्त्री,स्पष्ट राजनैतिक दिशानिर्देश के बिना, अपना काम ठीक से कर ही नहीं सकता..'- इशारा अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की ओर था..।
                
                                             
        18 जून को रिज़र्व बैंक 2012-13 में मौद्रिक नीति पर पहली तिमाही की समीक्षा पेश करने वाला है..। इस वक्त कच्चे तेल की कीमत, पिछले आठ महिनों में सबसे कम, 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे है..। लिहाज़ा बाज़ार को रिज़र्व बैंक से, कुछ रियायतों की आशा है..। पर क्या उतना ही काफी होगा..? ये भी सही है, कि भारत को आस पास की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के हालात से पूरी तरह अछूता रखना भी मुमकिन नहीं है..। तो क्या, दुनिया भर में कई अर्थव्यवस्थाएं जिस संकट से जूझ रही हैं, उसकी लहरों को भारत की नैया डगमगाने की इजाज़त दे दें..? 18 जून को ही, जी-20 देशों का सातवां शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है..। लास काबोस में सभी सदस्य देशों के नेता मिलेंगे..। इस बार की चर्चा, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों से लड़ने पर होगी..। फरवरी की बैठक पर भी यूरो संकट ही छाया रहा था..। और नवंबर में कान में हुए सम्मेलन में भी मुद्दा यही था..। इस बार की चर्चा से क्या निकल कर आएगा, उसका भी इंतज़ार करना होगा..। पर ये भारी भरकम पर्दा लेकर भी, सरकार उन सवालों से नज़रें नहीं चुरा सकती, जो हर रोज, हर आम आदमी पूछता है.., ये जानते हुए भी, कि इन सवालों का जवाब, उसे कभी नहीं मिलने वाला..।

Tuesday, June 12, 2012

अर्थव्यवस्था का उखड़ता प्लास्टर, बेरंग होती दीवारें कैसे ढकेंगे प्रणब दा ?

            एक गुलाबी काग़ज़..कुछ सितारे..कुछ रंग बिरंगी तितलियां..परियों वाले दो पोस्टर..और कुछ कल्पनाएं..। भाई ...मेरा रूम तो सज गया ..। बजट कम था, लेकिन इतना तो हो ही गया, कि दीवारों की बेरंगी छिप गई..। काश...अर्थव्यवस्था की दीवारों का उधड़ता प्लास्टर छिपाना भी इतना ही आसान होता..। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर 5.3 से घट कर 0.1 प्रतिशत..!! शोर मचा...तो सरकार ने कहा, कि विकास नहीं रुका है, बस...विकास की वृद्धि दर गिरी है..। कम से कम देश के वित्तमंत्री से तो, इससे अच्छे ही विश्लेषण की आशा थी..।
                           http://www.aajkikhabar.com/hindi/uploads/images/300/92149.jpg                                      
                          
              दरअसल ...उनका हर जवाब, यूपीए को ध्यान में रख होता है..। यूपीए से सवाल करो..तो फौरन जवाब हाज़िर..!.. लेकिन वित्तमंत्री से सवाल करो...तो मिलता है..विश्लेषण..। एस एंड पी ने जब रेटिंग गिराने की चेतावनी दी, तो इस पर वित्तमंत्री ने कहा, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है..। भारतीय अर्थव्यवस्था, फिर से रफ्तार पकड़ेगी..। प्रणब दादा, ये बात तो आपने तब भी कही थी, जब आर्थिक विकास दर, नौ सालों के सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई थी..। न आप भारत में निवेशकों को खींच पा रहे हैं, न ग्लोबल इकॉनोमी में देश की साख बचा पा रहे हैं, न घर में.., घर वालों के हालात सुधार पा रहे हैं..। महंगाई ..अभी और बढ़नी है,..हालांकि कच्चे तेल के दाम गिरे हैं..।
                 लेकिन ये सारे सवाल...कुछ ही घंटों में देश के ज़हन से उतर भी गए..। एक चैनल पर रामदेव, चैरिटी पर लगे टैक्स पर सवाल उठा रहे थे..दूसरे पर अटरली बटरली डिलीशियल गर्ल का 50वां जन्मदिन मनाया जा रहा था..। और बाकि बचे सारे चैनलों पर, ममता और मुलायम छाए हुए थे..। राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को ले कर, सियासी जोड़-तोड़ पर बहसें चल रही थीं..। खैर...वो भी ज़रूरी ही था..।
                लो जी...आज फिर लाइट चली गई ...!...बड़ी देर से मोहल्ले के ट्रांस्फार्मर से स्पार्किंग हो रही थी..। लगता है ... फुंक गया फिर से..। ये भी ज़्यादा लोड ले नहीं पाता..। ठीक हमारी अर्थव्यवस्था की तरह..!...बाहर लोगों की चहल कदमी की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं..। रात के 01.30 बज रहे हैं..। पता नहीं..कब इलेक्ट्रिशियन आएगा..और कब लाइट आएगी..। लेकिन यहां इतनी तसल्ली तो है ही,, कि इलेक्ट्रिशियन आएगा..तो सब ठीक कर देगा..। अर्थव्यवस्था से जो चेतावनियों की स्पार्किंग हो रही है, फ्यूज़ उड़ने से क्या रोक पाएंगे प्रणब दा..?

Monday, June 4, 2012

बंद गली के पार...



बंद गली के पार...
दरिया बहता है
बंद गली के पार..
सूरज रहता है..
band gali ke paar..
dariya behta hai
band gali ke paar
suraj rehta hai..


हवा भी चलती है खुली खुली
बारिश भी होती है...
मैं भी उड़ जाऊं उस पार
ख्वाहिश भी होती है..
छोटी सी खिड़की से मैंने
छुप के सब देखा है..
बंद गली के पार
सूरज रहता है.......
hawa bhi chalti hai khuli khuli
barish bhi hoti hai..
main bhi ud jaun us paar
khwahish bhi hoti hai..
choti si khidki se maine
chup ke sab dekha hai..
bad gali ke paar
suraj rehta hai...


सुबह सुबह पखेरू गाते हैं जब
सुनती हूं मैं भी..
पंखों का फड़फड़ाना..
धरा से क्षितिज तक उड़ान
मन ही मन तब
बुनती हूं मैं भी...
न रहूंगी देखना मन मार..
उड़ जाऊंगी इक दिन...
इस बंद गली के पार
जहां दरिया बहता है...
जहां सूरज रहता है...
subah subah pakheru gate hain jab
sunti hun main bhi..
pankhon ka phadphadana.
dhara se khisitij tak udaan
mann hi mann tab
bunti hun main bhi..
na rahungi main bhi mann maar..
ud jaungi ik din..
is band gali ke paar
jahan..dariya behta hai..
jahan..suraj rehta hai...