' प्रीती ने चैनल छोड़ दिया क्या?नहीं वो..कई दिनों से दिखाई नहीं दी इसीलिये पूछा..'
'तुमको बड़ी चिंता हो रही है, दिल आगया क्या ?'
दो पत्रकार, महिला सहकर्मी के बारे में बात कर रहे थे। ऐसी भाषा पहले सुन चुकी हूं। स्कूल और कॉलेज में भी। सामने भले कुछ ना कहें, लेकिन लड़कियों के बारे में मानसिकता कुछ खास बदली नहीं है अभी। ज़रा कोई बात करले, या हाल चाल ही पूछ ले, तो लोग चुटकी लेने लगते हैं। क्यों, क्या लड़कियों का दर्जा, अब भी पुरुष की नज़र में बदला नहीं है?
कुछ लोग मुझे महिलावादी कहते हैं। हो सकता है, सही कहते हों..। कभी-कभी कुछ बातों पर गुस्सा आ जाता है, तो कुछ पर हंसी..। कुछ ही दिन पहले, कुछ दोस्तों के बीच महिला आरक्षण को लेकर चर्चा चल रही थी। उनमें से एक..पक्ष में था, चार विपक्ष में..। मैं बरबस बोल उठी, महिलाओं को किसी आरक्षण की ज़रूरत नहीं..। वो इसके बिना भी सब कुछ हासिल कर सकती हैं। दो-तीन लोग मेरी ओर अजीब नज़रों से देखने लगे..। तब एहसास हुआ,कि मेरी बात क्या अर्थ लिया गया है ..। उस वक्त वो तिलमिलाहट महसूस हुई, कि क्या कहूं..।
आज से बीस साल पहले महिलाएं जहां थीं, आज कहीं आगे बढ़ चुकी हैं। अगले बीस सालों में और आगे बढ़ेंगी..। लेकिन, पुरुष समाज का एक बड़ा हिस्सा, जहां का तहां खड़ा है..। ज़माना बदला है, सोच नहीं बदली..।

पुरुष के नाम के बिना कुछ करने की कोशिश, आज भी सवालों के घेरे में रहती है..। ज़बरदस्ती लोग पुरुष के साथ नाम जोड़ने लगते हैं..। वो पुरुष कभी उस लड़की का बॉस होता है, कभी सहकर्मी, तो कभी ब्वॉयफ्रेंड..। सफलता का श्रेय, सीधे-सीधे उसकी मेहनत को देने में आज भी झिझक क्यों है..? ऐसा क्यों होता है कि, अक्सर, पुरुष बॉस, सही होते हुए भी महिला जूनियर को फेवर नहीं कर पाता..। उसे क्यों डर होता है, कि लोग उन दोनों का नाम जोड़ कर बदनाम कर देंगे..? 'अरे लड़की है ना.., इसके लिये क्या मुश्किल है?' - इस वाक्य के पीछे आज भी कई पुरुष अपनी कमज़ोरी छिपाने की कोशिश करते हैं..।
जानती हूं आज महिला दिवस नहीं है। पर, पुरुष का ये नज़रिया जब बारहों महीने रहता है, तो फिर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिये मैं महिला दिवस का इंतज़ार क्यों करूं..?
बचपन से सुनती आई हूं- 'संभल कर जाना', ' ज़्यादा हाथ -वाथ ना मिलाया करो दोस्तों से', ' लड़की हो, लड़की की तरह रहो',' नहीं, तुम कराटे क्लास कन्टिन्यू नहीं कर सकतीं.., सबके सामने इतनी उछल-कूद ठीक नहीं है' ..।
मेरी बातें पढ़ने वाले बहुत से पुरुषों को शायद फालतू लगें, या भावातिरेक में दिया गया भाषण..। फिर भी, मैं कहूंगी ज़रूर, क्योंकि जानती हूं, ये बातें सच हैं..। ये भी जानती हूं, कि लड़कियां ही नहीं, वो पुरुष भी मुझसे सहमत होंगे, जिनकी बहनें, बेटियां, और पत्नियां बाहर काम करने जाती हैं..।

'तुमको बड़ी चिंता हो रही है, दिल आगया क्या ?'
दो पत्रकार, महिला सहकर्मी के बारे में बात कर रहे थे। ऐसी भाषा पहले सुन चुकी हूं। स्कूल और कॉलेज में भी। सामने भले कुछ ना कहें, लेकिन लड़कियों के बारे में मानसिकता कुछ खास बदली नहीं है अभी। ज़रा कोई बात करले, या हाल चाल ही पूछ ले, तो लोग चुटकी लेने लगते हैं। क्यों, क्या लड़कियों का दर्जा, अब भी पुरुष की नज़र में बदला नहीं है?
कुछ लोग मुझे महिलावादी कहते हैं। हो सकता है, सही कहते हों..। कभी-कभी कुछ बातों पर गुस्सा आ जाता है, तो कुछ पर हंसी..। कुछ ही दिन पहले, कुछ दोस्तों के बीच महिला आरक्षण को लेकर चर्चा चल रही थी। उनमें से एक..पक्ष में था, चार विपक्ष में..। मैं बरबस बोल उठी, महिलाओं को किसी आरक्षण की ज़रूरत नहीं..। वो इसके बिना भी सब कुछ हासिल कर सकती हैं। दो-तीन लोग मेरी ओर अजीब नज़रों से देखने लगे..। तब एहसास हुआ,कि मेरी बात क्या अर्थ लिया गया है ..। उस वक्त वो तिलमिलाहट महसूस हुई, कि क्या कहूं..।
आज से बीस साल पहले महिलाएं जहां थीं, आज कहीं आगे बढ़ चुकी हैं। अगले बीस सालों में और आगे बढ़ेंगी..। लेकिन, पुरुष समाज का एक बड़ा हिस्सा, जहां का तहां खड़ा है..। ज़माना बदला है, सोच नहीं बदली..।
पुरुष के नाम के बिना कुछ करने की कोशिश, आज भी सवालों के घेरे में रहती है..। ज़बरदस्ती लोग पुरुष के साथ नाम जोड़ने लगते हैं..। वो पुरुष कभी उस लड़की का बॉस होता है, कभी सहकर्मी, तो कभी ब्वॉयफ्रेंड..। सफलता का श्रेय, सीधे-सीधे उसकी मेहनत को देने में आज भी झिझक क्यों है..? ऐसा क्यों होता है कि, अक्सर, पुरुष बॉस, सही होते हुए भी महिला जूनियर को फेवर नहीं कर पाता..। उसे क्यों डर होता है, कि लोग उन दोनों का नाम जोड़ कर बदनाम कर देंगे..? 'अरे लड़की है ना.., इसके लिये क्या मुश्किल है?' - इस वाक्य के पीछे आज भी कई पुरुष अपनी कमज़ोरी छिपाने की कोशिश करते हैं..।
जानती हूं आज महिला दिवस नहीं है। पर, पुरुष का ये नज़रिया जब बारहों महीने रहता है, तो फिर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिये मैं महिला दिवस का इंतज़ार क्यों करूं..?
बचपन से सुनती आई हूं- 'संभल कर जाना', ' ज़्यादा हाथ -वाथ ना मिलाया करो दोस्तों से', ' लड़की हो, लड़की की तरह रहो',' नहीं, तुम कराटे क्लास कन्टिन्यू नहीं कर सकतीं.., सबके सामने इतनी उछल-कूद ठीक नहीं है' ..।
मेरी बातें पढ़ने वाले बहुत से पुरुषों को शायद फालतू लगें, या भावातिरेक में दिया गया भाषण..। फिर भी, मैं कहूंगी ज़रूर, क्योंकि जानती हूं, ये बातें सच हैं..। ये भी जानती हूं, कि लड़कियां ही नहीं, वो पुरुष भी मुझसे सहमत होंगे, जिनकी बहनें, बेटियां, और पत्नियां बाहर काम करने जाती हैं..।
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