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Friday, February 25, 2011

रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे..

रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे..
उसका आंचल फिर हुआ मैला किसी के पाप से..
  
    आंसुओं की धार से वो पाप को धोती रही..
    ढीठ निकली आत्मा इंसान की..सोती रही..

दीप लेके हाथ से पानी पे तैराता रहा..
रौशनी की आड़ में अंधेर लहराता रहा..
    
    आरती के साथ जय जयकार सब गाते रहे..
    बहती गंगा देख अपने पाप छुड़वाते रहे..

गंगा रोती रह गई..आचल भिगोती रह गई..
सब पुण्य लेजाते रहे..वो पाप ढोती रह गई..
  
     दस-पांच रुपयों में धुले..अरबों-करोड़ों पाप थे..
    रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे......
                                                  
                                      





                                                                                                     27.07.10, 01:20 AM

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