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Sunday, February 6, 2011

कहिये..तो कमाल का कहिये..

कभी कभी बहुत सी बातें हम सिर्फ इसलिये कह देते हैं..क्योंकि हमें लगता है कि..हम क्या कमाल का कहते हैं..। इसीलिये.. कोई सुने न सुने.., हम तो बस कह के रहते हैं ..! क्या करूं..आदत से मजबूर हूं..। क्या पता ..कभी कोई एक आध श्रोता मिल ही जाए। इसीलिये..मैं भी कहूंगी ज़रूर..।
लाखों की भीड़ में मुझे उन लोगों की तलाश है..,जो ये ज़रा कम सोचें..कि ज़्यादातर लोग क्या सोचते हैं..। और अपनी अलग सोच को..जो बिना झिझके..बिना डरे..सारी दुनिया से बांट सकें..। यकीन कीजिये..जो लोग ऐसा कर पाते हैं.., कमाल भी अक्सर वही लोग किया करते हैं..। सभी मित्रगण.., इस पन्ने पर अपनी बात कहने के लिये आमन्त्रित हैं..। मुझे यकीन है कि..बातों बातों में..कोई न कोई कमाल की बात निकल कर ज़रूर आएगी....

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