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Tuesday, August 30, 2011

ऐ ज़िन्दगी..ज़रा सांस ले..

ऐ ज़िन्दगी..ज़रा सांस ले..अभी सांझ है..थोड़ी देर रुक..
मैं ज़रा सुकून से देख लूं.....तूने क्या दिया..मैंने क्या लिया..

मेरे आइने में दरार थी, वो जो टूटा.. मेरा ही अक्स था..
टुकड़ों ही में, मैं बंटा रहा, थोड़ा मरा..थोड़ा जिया..
ऐ ज़िन्दगी..ज़रा सांस ले...

पानी पे एक लकीर थी..मेरे इश्क की तक़दीर थी..
मैं डूबता -तरता रहा...प्यासा मरा..प्यासा जिया...
ऐ ज़िन्दगी..ज़रा सांस ले...

आधी -अधूरी किताब है...आंखों में थोड़े से ख्वाब हैं..
दर-दर पे उनके लिये फिरा, आधा मरा...आधा जिया...
ऐ ज़िन्दगी...ज़रा सांस ले.... 

जूगनूं सा हाथों में बंद था, थी स्याह जब..वो ही संग था..
जलता रहा -बुझता रहा, सुबहा तलक...मेरा दिया..
ऐ ज़िन्दगी..ज़रा सांस ले....

मीलों चला मैं बेसबब, ना मुकाम था..ना ही रास्ता..
छाले ही छाले हैं पांव में...चलता रहा...चलता रहा...
ऐ ज़िन्दगी ...ज़रा सांस ले...




Monday, August 29, 2011

अब के घर लाऊंगी..तो ले आऊंगी..

आज पता नहीं क्यों रात भर नींद नहीं आई। रात भर चैनल बदलती रही..कभी फेस बुक के पन्ने पलटती रही..। अभी अभी घड़ी देखी - अरे बाप रे.., सुबह तो हो भी गई..!! चिड़ियों के चहकने की आवाज़ आरही है। मेरे घर में खिड़की नहीं है..वरना उन्हें देख भी पाती। यहां तो सांसें..जैसे एसी की गुलाम हैं।
            रोज़ सुबह, मैं अपने शहर को मिस करती हूं। वहां सूरज उगता है, तो आसमान सुनहरे लाल रंग का दिखता है। जब स्कूल में पढ़ती थी..,तो छत पर लहराते आते पेड़ों के पत्तों से, अक्सर बातें किया करती थी। सफेदे के तने को थाम कर, बायोलॉजी के चैप्टर्स का रट्टा लगाया है मैंने..। अब तो वो पेड़ भी नहीं रहा। पर छत से सूरज अब भी वैसा ही दिखता होगा..। अब के घर जाऊंगी..तो मिलूंगी उससे..।
       बड़े तालाब की मछलियां भी मुझे याद करती होंगी..। कई सालों से उन्हें आटा नहीं खिलाया..।मां-पापा के आगे आगे..छोटे भाई की उंगली पकड़ कर किनारे-किनारे चलते वक्त, उससे अक्सर झगड़ा हो जाता था..। अब भी हम अक्सर झगड़ते हैं..। पर अब हम अक्सर फोन पर लड़ते हैं..। एक ही शहर में रहते हैं..फिर भी हफ्तों मिल नहीं पाते..। दोनों की नौकरियां ही ऐसी हैं..। इस दिल्ली शहर का दर्द ही यही है..। यहां सब कुछ मिलता है..। बस..वक्त ही नहीं मिलता..। मेरे शहर में ऐसा नहीं होता..। सुबह के नाश्ते पर ना सही, रात के खाने पर सब एक साथ ज़रूर होते हैं..। ढेर सारी बातें करते हैं..और सपने भी एक साथ देखते हैं..।
         मेरे सबसे पुराने स्कूल में, अब टीचर्स भी नए आगए हैं..। पुराने टीचर्स सब रिटायर हो गए हैं..। पता नहीं क्यूं..आज यहां बैठे..प्रार्थना के पहले की घंटी याद आरही है मुझे..। आहूजा दीदी की क्लास में- रोल नम्बर ग्यारह..- उपस्थित हूं दीदी..!!...,,,  अब के घर जाऊंगी..तो स्कूल का एक चक्कर काट के आऊंगी मैं..। प्ले ग्राउंड में वो छोटा सा फव्वारा..शायद अब भी होगा..।
         कहते हैं, सरस्वती मेरे शहर के नीचे-नीचे बहती है..। बहुत बड़ा तीर्थ है ये। यहां कृष्ण ने विराट स्वरूप प्रकट किया था, गीता रच डाली थी..। जब से शहर छूटा है, गीता के श्लोक भी छूट से गए हैं..। स्टडी रूम की बुक शेल्फ पर कहीं रखी होगी मेरी गीता..। अब के घर जाऊंगी..तो उठा लाऊंगी उसे भी..।    

Brahmsarovar, Kurukshetra
पता नहीं क्यों ये सब कुछ कहती जा रही हूं..। नौकरी के लिये घर से दूर रहने वाली, मैं अकेली तो नहीं हूं..। मेरी तरह करोड़ों लड़के ल़डकियां, करियर के लिये , छोटे शहरों से निकल कर, बड़े शहरों का रुख करते हैं। शायद..सभी अपने शहर को, मेरी ही तरह मिस करते हैं..।
        सुबह की पूजा का समय हो गया है..। मां का फोन भी आता ही होगा..। ये जानने के लिये..कि कहीं मैं अब तक सो तो नहीं रही हूं..।

Saturday, August 27, 2011

जनतंत्र मुबारक !


अण्णा ने आसमान में छेद कर दिया है। संसद में प्रस्ताव पारित होने के साथ ही तमाम सियासी गड़गड़ाहटें भी शांत हो गईं हैं..। जन लोकपाल का तीर, जनता की कमान से छूट चुका है। स्थाई समिति की औपचारिकताएं अगर निर्विघ्न पूरी होती हैं,तो जल्द ही, कई छोटे बड़े सफेदपोश घोटालेबाज़, इसके निशाने पर होंगे..।
                  ये दिन, वो पल, इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए। आंदोलन का तेरहवां दिन, करप्शन की तेरहवीं का दिन है। रामलीला मैदान पर इस बार, भ्रष्टाचार के रावण का दहन होगा। 


                आज दफ्तर से लौटते वक्त रामलीला मैदान के सामने गुज़रना हुआ..। वैसे , छह साल से ज़्यादा हो गए मुझे दिल्ली में रहते, मगर रामलीला मैदान आज पहली बार देखा। ओबी वैन्स की तकरीबन डेढ़ किलोमीटर लम्बी कतार लगी थी..। मैदान के बाहर खुशी से झूमते - नाचते लोग दिखाई दिये। आइसक्रीम के ठेलों पर खड़े प्रेमी जोड़े भी, हाथ में तिरंगा लिये थे। देख कर अच्छा लगा। 
             'वो बड़ा सा स्टेज देख रही हैं मैडम जी', गाड़ी के ड्राइवर ने हाथ से इशारा करके दिखाया - 'वहीं बैठते हैं अण्णा। उसी सफेद शामियाने के नीचे।' उसकी आवाज़ में श्रद्धा थी। वैसी श्रद्धा, जैसी, मंदिर के सामने से गुज़रते वक्त, सिर झुका लेने वाले भक्त की आंखों में होती है। फिर उसने सड़क पर पड़े गड्ढे की ओर इशारा किया- ' ये देखिये मैडम, करोड़ों के घोटाले करने वालों के हेलिकॉप्टर थोड़े ही इस सड़क से गुज़रते हैं। इन गड्ढों में तो हम जैसों के स्कूटर का पहिया ही फंसता है। हमें देखने कौन आता है मैडम जी?'  वो पूरे रास्ते बोलता चला गया। उसे कभी बच्चों के एडमिशन का दिन याद आता, तो कभी ड्राइविंग लाइसेंस की कतार। मगर उसकी आवाज़ में अजीब सी शांति थी। मानो, अनशन उसी ने किया हो। उसे विश्वास था कि, अब सब ठीक हो जाएगा..। 
               
          वोट डालने के बाद उंगली पर जो निशान लगाया जाता है, उसी काले निशान की ताकत, काली कमाई के खिलाफ खड़ी हो गई है। अण्णा ने सभी उंगलियों को बांध, मुट्ठी बना दिया है। जिसके सामने सियासी सिपहसालार पस्त हो गए। 
         जनतंत्र की जीत का,  लोकतंत्र की सुबह का ये जश्न, आपको भी मुबारक, और मुझे भी।

Friday, August 26, 2011

जन लोकपाल- कांग्रेस का डेली सोप


                                                                                       
लो भइया । मम्मी जी के बेटे जी ने मुंह खोला। पिछली बार जब चुप्पी साध गए थे, तब भी परेशानी में पड़ गए थे। और अब कि बार जब बोले हैं, तो अपने मामाओं ( कांग्रेस ) को परेशानी में डाल दिया है। वैसे सुना है कि, शुक्रवार शाम जब इनके घर के बाहर अण्णा के समर्थक, प्रदर्शन करने पहुंचे, तो राहुल ने गांधीगीरी दिखाते हुए, प्रदर्शनकारियों के लिये कोल्ड ड्रिंक्स और समोसे भिजवाए..!! हा..ह्..हा ...।।।
               वैसे मुद्दा इतना गम्भीर है , कि पर इस मज़ाक करना ठीक नहीं लगता। लेकिन, कांग्रेस ने इसका सचमुच मज़ाक बना डाला है। जनलोकपाल को लेकर इन दिनों जो कुछ भी हुआ है, उसे देख कर, ऐसा लगता है, जैसे किसी डेली सोप की कहानी चल रही हो। हफ्तों तक सीन नहीं बदलता..। एक ही डायलॉग, चार-चार बार, अलग-अलग कैमरा एंगल से रिपीट होता रहता है। ठीक वैसे ही, अण्णा और उनकी टीम, रोज़ वही मांगें दोहराते हैं। जिनके जवाब में , सरकार, हर रोज़ , हां और ना के बीच एक नया जवाब तैयार करती है।
              जनलोकपाल की आवाज़ संसद तक पहुंचते पहुंचते अनशन की एकादशी बीत गई। मगर, नियमों के जाल में बात ऐसी उलझी, कि ना बहस हुई, ना अण्णा ने अन्न ग्रहण किया। दरअसल, जंतर-मंतर पर कांग्रेस जिसे खेल समझ रही थी, वो रामलीला मैदान तक आते-आते, रण में तब्दील गया..। एक ऐसा रण, जिसके एक ओर सत्ता के रथी और महारथी खड़े हैं। जबकि दूसरी ओर खड़े हैं..एक सौ पच्चीस करोड़ पैदल निहत्थे सिपाही..। 
                               

                  खुद अण्णा ने नहीं सोचा होगा, कि इस आंदोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिलने वाला है। आज़ादी की लड़ाई के बाद, ये पहली बार है, जब पंद्रह अगस्त , या छब्बीस जनवरी के अलावा, कहीं वन्दे मातरम, या भारत माता की जय का नारा सुनाई पड़ा है। असल में ये क्रांति दस-पांच दिनों की लड़ाई नहीं है।ये चिंगारी तो सालों से पिस रहे आम आदमी के अंदर अंदर पल रही थी। अण्णा ने उस चिंगारी को आग बना डाला है। जिसे सत्ताधारी फूंक मार कर बुझाने की कोशिश कर रहे है..।
                इस लड़ाई में मेरी कलम भी लगातार अपनी बात कहेगी..। मानती हूं, कि देश बातों से नहीं चलता। पर अगर , किसी बात से देश की चाल बदलती हो, तो मैं कहूंगी ज़रूर..।

( सभी कार्टून गूगल के सौजन्य से लिये गए हैं। इन्हें तैयार करने वाले कलाकारों को नहीं जानती, पर इनकी खेंची लकीरों ने, मुझे मेरी बात कहने में मदद दी है। धन्यवाद )