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Saturday, August 27, 2011

जनतंत्र मुबारक !


अण्णा ने आसमान में छेद कर दिया है। संसद में प्रस्ताव पारित होने के साथ ही तमाम सियासी गड़गड़ाहटें भी शांत हो गईं हैं..। जन लोकपाल का तीर, जनता की कमान से छूट चुका है। स्थाई समिति की औपचारिकताएं अगर निर्विघ्न पूरी होती हैं,तो जल्द ही, कई छोटे बड़े सफेदपोश घोटालेबाज़, इसके निशाने पर होंगे..।
                  ये दिन, वो पल, इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए। आंदोलन का तेरहवां दिन, करप्शन की तेरहवीं का दिन है। रामलीला मैदान पर इस बार, भ्रष्टाचार के रावण का दहन होगा। 


                आज दफ्तर से लौटते वक्त रामलीला मैदान के सामने गुज़रना हुआ..। वैसे , छह साल से ज़्यादा हो गए मुझे दिल्ली में रहते, मगर रामलीला मैदान आज पहली बार देखा। ओबी वैन्स की तकरीबन डेढ़ किलोमीटर लम्बी कतार लगी थी..। मैदान के बाहर खुशी से झूमते - नाचते लोग दिखाई दिये। आइसक्रीम के ठेलों पर खड़े प्रेमी जोड़े भी, हाथ में तिरंगा लिये थे। देख कर अच्छा लगा। 
             'वो बड़ा सा स्टेज देख रही हैं मैडम जी', गाड़ी के ड्राइवर ने हाथ से इशारा करके दिखाया - 'वहीं बैठते हैं अण्णा। उसी सफेद शामियाने के नीचे।' उसकी आवाज़ में श्रद्धा थी। वैसी श्रद्धा, जैसी, मंदिर के सामने से गुज़रते वक्त, सिर झुका लेने वाले भक्त की आंखों में होती है। फिर उसने सड़क पर पड़े गड्ढे की ओर इशारा किया- ' ये देखिये मैडम, करोड़ों के घोटाले करने वालों के हेलिकॉप्टर थोड़े ही इस सड़क से गुज़रते हैं। इन गड्ढों में तो हम जैसों के स्कूटर का पहिया ही फंसता है। हमें देखने कौन आता है मैडम जी?'  वो पूरे रास्ते बोलता चला गया। उसे कभी बच्चों के एडमिशन का दिन याद आता, तो कभी ड्राइविंग लाइसेंस की कतार। मगर उसकी आवाज़ में अजीब सी शांति थी। मानो, अनशन उसी ने किया हो। उसे विश्वास था कि, अब सब ठीक हो जाएगा..। 
               
          वोट डालने के बाद उंगली पर जो निशान लगाया जाता है, उसी काले निशान की ताकत, काली कमाई के खिलाफ खड़ी हो गई है। अण्णा ने सभी उंगलियों को बांध, मुट्ठी बना दिया है। जिसके सामने सियासी सिपहसालार पस्त हो गए। 
         जनतंत्र की जीत का,  लोकतंत्र की सुबह का ये जश्न, आपको भी मुबारक, और मुझे भी।

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