लो भइया । मम्मी जी के बेटे जी ने मुंह खोला। पिछली बार जब चुप्पी साध गए थे, तब भी परेशानी में पड़ गए थे। और अब कि बार जब बोले हैं, तो अपने मामाओं ( कांग्रेस ) को परेशानी में डाल दिया है। वैसे सुना है कि, शुक्रवार शाम जब इनके घर के बाहर अण्णा के समर्थक, प्रदर्शन करने पहुंचे, तो राहुल ने गांधीगीरी दिखाते हुए, प्रदर्शनकारियों के लिये कोल्ड ड्रिंक्स और समोसे भिजवाए..!! हा..ह्..हा ...।।।
वैसे मुद्दा इतना गम्भीर है , कि पर इस मज़ाक करना ठीक नहीं लगता। लेकिन, कांग्रेस ने इसका सचमुच मज़ाक बना डाला है। जनलोकपाल को लेकर इन दिनों जो कुछ भी हुआ है, उसे देख कर, ऐसा लगता है, जैसे किसी डेली सोप की कहानी चल रही हो। हफ्तों तक सीन नहीं बदलता..। एक ही डायलॉग, चार-चार बार, अलग-अलग कैमरा एंगल से रिपीट होता रहता है। ठीक वैसे ही, अण्णा और उनकी टीम, रोज़ वही मांगें दोहराते हैं। जिनके जवाब में , सरकार, हर रोज़ , हां और ना के बीच एक नया जवाब तैयार करती है।
जनलोकपाल की आवाज़ संसद तक पहुंचते पहुंचते अनशन की एकादशी बीत गई। मगर, नियमों के जाल में बात ऐसी उलझी, कि ना बहस हुई, ना अण्णा ने अन्न ग्रहण किया। दरअसल, जंतर-मंतर पर कांग्रेस जिसे खेल समझ रही थी, वो रामलीला मैदान तक आते-आते, रण में तब्दील गया..। एक ऐसा रण, जिसके एक ओर सत्ता के रथी और महारथी खड़े हैं। जबकि दूसरी ओर खड़े हैं..एक सौ पच्चीस करोड़ पैदल निहत्थे सिपाही..।
खुद अण्णा ने नहीं सोचा होगा, कि इस आंदोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिलने वाला है। आज़ादी की लड़ाई के बाद, ये पहली बार है, जब पंद्रह अगस्त , या छब्बीस जनवरी के अलावा, कहीं वन्दे मातरम, या भारत माता की जय का नारा सुनाई पड़ा है। असल में ये क्रांति दस-पांच दिनों की लड़ाई नहीं है।ये चिंगारी तो सालों से पिस रहे आम आदमी के अंदर अंदर पल रही थी। अण्णा ने उस चिंगारी को आग बना डाला है। जिसे सत्ताधारी फूंक मार कर बुझाने की कोशिश कर रहे है..।
इस लड़ाई में मेरी कलम भी लगातार अपनी बात कहेगी..। मानती हूं, कि देश बातों से नहीं चलता। पर अगर , किसी बात से देश की चाल बदलती हो, तो मैं कहूंगी ज़रूर..।
( सभी कार्टून गूगल के सौजन्य से लिये गए हैं। इन्हें तैयार करने वाले कलाकारों को नहीं जानती, पर इनकी खेंची लकीरों ने, मुझे मेरी बात कहने में मदद दी है। धन्यवाद )


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