ह्म्म्म्म्म्म्...
तो..आज का दिन भी खत्म हो गया..। आज नींद भी जल्दी आने लगी थी..। मगर सोने में रोज़ से भी ज़्यादा देरी हो गई है..। शायद थकान ज़्यादा हो गई है आज..। सुबह छह बजे से लेकर..रात के साढ़े आठ बजे तक, एक भी पल चैन का नहीं मिला..। अगर सरिता ना होती..तो शायद घर का खाना भी नसीब ना होता ।
सरिता..मेरी जादू की छड़ी..। मेरा सुबह का अलार्म..। सरिता ना हो तो मेरा ना जाने क्या हो..। मेरे घर पर काम करती है सरिता..। सुबह-सुबह उसकी डोर बेल से ही मेरी आंख खुलती है रोज़..। मुझसे नौ साल छोटी है, मगर शादी को पांच साल हो चुके हैं..! प्यारी सी नेपाली लड़की है..। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार..। थोड़ी पागल है..। मेरी हर बात को..नेपाली में गुनगुनाने लगती है..। मुझे भाषा समझ में नहीं आती..मगर वो गाती अच्छा है..। मेरे तैयार होने तक..घर का सारा काम निपटाती है..। मैं वक्त पर दफ्तर के लिये निकल जाऊं..इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसी के सर होती है..। जिसे वो बखूबी निभाती है..। कभी कभार..मुझे बाल बनाते हुए गौर से देखती है..। आइने के सामने..मेरे पीछे खड़ी हो जाती है.., मायूस चेहरा लेकर..। कहती है- ' दीदी, मैं बहुत रोई..। मगर इतना छोटी सी का सादी बना दिया मेरे मां-बाप ने..। हमारे गांव में बऊऊत जल्दी सादी कर देते दीदी..।'
मैं...और सरिता.., दो कामकाजी लड़कियां..। दोनों स्वावलंबी..। दोनों आजीविका के लिये घऱ से दूर..परदेस में..। मगर दोनों की ज़मीन अलग..। दोनों के आसमान भी अलग..और उड़ान भी..। सरिता के पंख..बहुत पहले तोड़ दिये गए..। देर तक मेरे यहां बैठी रहती है..। काम खत्म होने के बाद..कभी कभी टीवी देखने लगती है..। और हीरो के डायलॉग बोल कर सुनाती है..। और कभी- कभी..चुप चाप देखती रहती है मुझे..।मानो अपने को आसमान को देख रही हो..। छटपटाई सी..हालात से बेबस..और नाराज़..। नेपाली में मायके की याद का गीत गुनगुनाने लगती है..।
एक दिन काम करते करते अचानक बोली - ' आज मेरा मरद से लराई हो गया दीदी..।'
' क्यों?'
' मईइइ कुछ बोली...वो माना नईईई...तो मैं गुस्सा हो गया..। वो मेरे को सॉरी बी बोला दीदी..। पर मैं नई मानी..। आज में जल्दी चली जाऊं..? कमरे का चाबी बी नई छोड़ के आई मईई । दीदी मैं जाऊं..???? '
....................... सरिता चली जाती है रोज़..। और रोज़.....मुझे सोच में डाल जाती है..।
सरिता के कसूरवारों पर गुस्सा आता है..। पर मैं भी कुछ नहीं कर सकती..। न तो उसका आसमान बदल सकती हूं.., न उसके पंखों में परवाज़ भर सकती हूं..। तो सोचा..क्यों ना सरिता को आप सब से मिलवाया जाए..। सरिता उड़ नहीं सकती तो क्या..हमारा आसमान..ज़रा देर के लिये उसकी ओर झुक तो सकता है ना..। परवाज़ ना सही..पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज़ ही सही..। पांव पत्थर के सही, नज़र के दू.....र तलक देख सकने का एहसास ही सही..। बूंद दो बूंद से प्यास नहीं बुझेगी..जानती हूं। मगर..भरपूर प्यास भी..ज़िन्दा होने का ही सबूत होती है..।
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तो..आज का दिन भी खत्म हो गया..। आज नींद भी जल्दी आने लगी थी..। मगर सोने में रोज़ से भी ज़्यादा देरी हो गई है..। शायद थकान ज़्यादा हो गई है आज..। सुबह छह बजे से लेकर..रात के साढ़े आठ बजे तक, एक भी पल चैन का नहीं मिला..। अगर सरिता ना होती..तो शायद घर का खाना भी नसीब ना होता ।
सरिता..मेरी जादू की छड़ी..। मेरा सुबह का अलार्म..। सरिता ना हो तो मेरा ना जाने क्या हो..। मेरे घर पर काम करती है सरिता..। सुबह-सुबह उसकी डोर बेल से ही मेरी आंख खुलती है रोज़..। मुझसे नौ साल छोटी है, मगर शादी को पांच साल हो चुके हैं..! प्यारी सी नेपाली लड़की है..। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार..। थोड़ी पागल है..। मेरी हर बात को..नेपाली में गुनगुनाने लगती है..। मुझे भाषा समझ में नहीं आती..मगर वो गाती अच्छा है..। मेरे तैयार होने तक..घर का सारा काम निपटाती है..। मैं वक्त पर दफ्तर के लिये निकल जाऊं..इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसी के सर होती है..। जिसे वो बखूबी निभाती है..। कभी कभार..मुझे बाल बनाते हुए गौर से देखती है..। आइने के सामने..मेरे पीछे खड़ी हो जाती है.., मायूस चेहरा लेकर..। कहती है- ' दीदी, मैं बहुत रोई..। मगर इतना छोटी सी का सादी बना दिया मेरे मां-बाप ने..। हमारे गांव में बऊऊत जल्दी सादी कर देते दीदी..।'
मैं...और सरिता.., दो कामकाजी लड़कियां..। दोनों स्वावलंबी..। दोनों आजीविका के लिये घऱ से दूर..परदेस में..। मगर दोनों की ज़मीन अलग..। दोनों के आसमान भी अलग..और उड़ान भी..। सरिता के पंख..बहुत पहले तोड़ दिये गए..। देर तक मेरे यहां बैठी रहती है..। काम खत्म होने के बाद..कभी कभी टीवी देखने लगती है..। और हीरो के डायलॉग बोल कर सुनाती है..। और कभी- कभी..चुप चाप देखती रहती है मुझे..।मानो अपने को आसमान को देख रही हो..। छटपटाई सी..हालात से बेबस..और नाराज़..। नेपाली में मायके की याद का गीत गुनगुनाने लगती है..।
एक दिन काम करते करते अचानक बोली - ' आज मेरा मरद से लराई हो गया दीदी..।'
' क्यों?'
' मईइइ कुछ बोली...वो माना नईईई...तो मैं गुस्सा हो गया..। वो मेरे को सॉरी बी बोला दीदी..। पर मैं नई मानी..। आज में जल्दी चली जाऊं..? कमरे का चाबी बी नई छोड़ के आई मईई । दीदी मैं जाऊं..???? '
....................... सरिता चली जाती है रोज़..। और रोज़.....मुझे सोच में डाल जाती है..।
सरिता के कसूरवारों पर गुस्सा आता है..। पर मैं भी कुछ नहीं कर सकती..। न तो उसका आसमान बदल सकती हूं.., न उसके पंखों में परवाज़ भर सकती हूं..। तो सोचा..क्यों ना सरिता को आप सब से मिलवाया जाए..। सरिता उड़ नहीं सकती तो क्या..हमारा आसमान..ज़रा देर के लिये उसकी ओर झुक तो सकता है ना..। परवाज़ ना सही..पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज़ ही सही..। पांव पत्थर के सही, नज़र के दू.....र तलक देख सकने का एहसास ही सही..। बूंद दो बूंद से प्यास नहीं बुझेगी..जानती हूं। मगर..भरपूर प्यास भी..ज़िन्दा होने का ही सबूत होती है..।
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| बह जाने दो इस सरिता को.... |
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