रेत पर पानी की जिस परछाई के पीछे हिरणी भागती है..वो भ्रम ही उसे ज़िन्दा रखता है। उसी भ्रम में जीवन की आशा होती है..अमृत की बूंदों सा विश्वास होता है..जो बार-बार टूटने पर भी बना रहता है। तब तक...जब तक वही भ्रम..उसके प्राण नहीं ले लेता..।
बड़ी अजीब होती हैं मन की तृष्णाएं..। ना हों ऐसा सम्भव नहीं, और अगर हों..तो जीवन उन्हीं में उलझ कर रह जाता है..। क्या-क्या नहीं करते हम इनके लिये? किसी एक तृष्णा को पाने के लिये..अपना सब कुछ खोने को तैयार हो जाते हैं..! वो भी सब कुछ छोड़ने को तैयार है..। अपना करियर..मां-बाप..दोस्त..सपने - सब कुछ..। पुरानी दोस्त है मेरी..। कहती है..उसके बिना नहीं जी सकती..। पगली कहीं की..! ऐसे कहीं कोई किसी के लिये मरता है क्या..? वो भी किसी ऐसे के लिये, जिसे कोई फर्क ना पड़ता हो ..? पर वो है कि समझती ही नहीं..! कितना समझाया मैंने उसे- देख.., ऐसे तो तू खुद को खत्म कर रही है..। ये कहां की समझदारी है भला?, और ज़रा ये तो सोच..तेरे मां-बाप पर क्या बीतेगी..? 'जानती हूं..'- वो बोली- 'सब कुछ समझती हूं..। काश..वो भी समझ पाता..।' और फिर एक ठंडी सांस भर कर..वो चुप हो गई..। 'अरे इसे कुछ मत समझाओ..' - पास बैठे दूसरे दोस्त ने कहा..। 'ये अपने आप में है ही नहीं..। मर जाएगी देखना..और वो रोने तक नहीं आएगा..।' ये सुन कर वो रोने लगी..बड़ी मुश्किल से चुप कराया है उसे..।
अब ये मृगतृष्णा नहीं है..तो और क्या है..? मन के बहुत से भ्रम ऐसे होते हैं..जिन्हें हम सच मान कर जीने लगते हैं..। ठोकर लगने पर भी आंख नहीं खोलते..। वही भ्रम हमारी ज़िन्दगी बन जाते हैं..। और वही जीवन का अन्त भी..। यही होगा उसके साथ भी शायद..! रेत पर भागते भागते,एक दिन खत्म हो जाएगी,वो भी..और उसकी तृष्णा भी..।
समझ नहीं आता..कैसे समझाऊं उसे..? ज़िन्दगी बहुत कीमती होती है..इसे यूं बर्बाद नहीं करते..तुम पर ज़िम्मेदारियां हैं..तुम्हारे ना सही, तुम्हारे परिवार के सपने तो तुमसे जुड़े हैं ना..! उन्हें यूं नहीं तोड़ सकतीं तुम..ये बोझ कैसे उठाओगी बोलो? ...'तुम मुझे समझाने की कोशिश मत करो'- वो नाराज़ हो गई मुझ पर- 'पत्रकार हो ना..बड़ी -बड़ी बातें करना आता है तुम्हें बस..। तुम क्या जानो..भावनाएं क्या होती हैं..पीड़ा किसे कहते हैं..तुम्हारा तो दिन हेडलाइन से शुरू होता है..और प्राइमटाइम पर ख़त्म हो जाता है..। तुम्हारी लाइफ, बुलेटिन में आने वाले दो ब्रेक जितनी ही लम्बी होती है बस..।' उसने मुझे लाजवाब कर दिया..। दिन भर शब्दों से खेलने वाली मैं..उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाई..।
देर तक सोचती रही..क्या सचमुच मैं उसकी भावनाओं को नहीं समझ पा रही हूं..? मैं जो करने की कोशिश कर रही थी..कहीं वो उसके जीवन में दखलअंदाज़ी तो नहीं थी..? क्या सचमुच...उसे समझाने का कोई तरीका नहीं है..? वो कुछ भी कहे..उसे यूं उसके हाल पर छोड़ भी तो नहीं सकती..। क्या उसके माता पिता को खबर कर दूं..? नहीं..ऐसा करना भी ठीक नहीं होगा..। उसके हालात..और जटिल हो जाएंगे..। कहीं कुछ कर-वर लिया तो..!! तो क्या करूं अब..?..कोई तो हल होगा इस समस्या का..। सोचते-सोचते अपने पीजी लौट आई..। शाम से सोच रही हूं..। अगर सुबह तक उसकी बात का जवाब तलाश कर सकी..तो कल फिर उसे समझाने की कोशिश करूंगी.....