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Tuesday, November 15, 2011

सॉरी सरिता..

दिल कहीं..दिमाग कहीं और..। जज़्बात कुछ कहते हैं..हालात कुछ..। कभी-कभी ऐसी परीक्षा सामने खड़ी हो जाती है, कि सोचने समझने की शक्ति जवाब दे जाती है..। हम ग़लत फैसले ले बैठते हैं..। दिमाग के कहने में आकर..मैंने भी एक फैसला लिया था एक दिन..। लगता है ...गलत ही था..।
          सरिता याद होगी आपको..! मेरी सरिता..। मेरा अलार्म क्लॉक..मेरी सहेली..और मेरे घर की मैनेजर..। कहने को काम वाली बाई थी, पर उससे लगाव सा हो गया था मुझे..। एक रात उसका फोन आया मेरे पास..। तकरीबन साढ़े दस बजे..। मुझे लगा, कल छुट्टी लेना चाहती होगी..। पर बात वो नहीं थीं..। उसके पति ने शराब ने नशे में पीट पीट कर उसे रात के वक्त घर से निकाल दिया था..।
                                     
          पार्क में बैंच पर देर तक बैठने के बाद..उसे मेरा ख्याल आया, और ,  बड़ी उम्मीद से उसने पीसीओ से मुझे फोन किया..। बोली- दीदी, मैं रात को आपके पास आ जाऊं..? अभी घर नहीं जाऊंगा..श्याम मारेगा..। उसकी बात सुन कर मुझे बड़ा दर्द हुआ..। लगा..बेचारी..कितनी तकलीफ में है..। उसे मेरी मदद चाहिये..। फिर ख्याल आया, कि, हो सकता है उसका पति उसे घर लेजाने के लिये आए..। ऐसे में उसे वहां ना पाकर, वो ना जाने क्या सोचे..? उन दोनों का रिश्ता और बिगड़ सकता है..। मैंने और सोचा....। सरिता का पति मेरा घऱ जानता है..। और ये भी, कि सरिता मुझसे मदद मांग सकती है..। ऐसे में सरिता पार्क में ना मिली..और वो घऱ उसे तलाशता हुआ चला आया तो..? पूरी कॉलोनी के सामने तमाशा हो जाएगा..!! मेरी सोच और आगे बढ़ी..। पति पत्नी में तनाव हो..और कोई बाहरी शख्स,,दोनों में से किसी एक की ओर जाए, तो अक्सर..तनाव और बढ़ जाता है..। मेरी हमदर्दी, इस कड़वाहट को ज़हर में तब्दील करने का काम कर सकती थी..। और मैं ये इल्ज़ाम लेने को तैयार नहीं थी..। दस मिनट सोचने के बाद, मैंने सरिता को मना कर दिया..। बहाना बना दिया..।
          इस बात को महीनों बीच चुके हैं..। उसके दो दिन बाद..सरिता काम पर लौटी..। बुरी तरह घायल..मार खाई हुई..। चेहरा सूजा हुआ..और तीन दिनों से भूखी..। मैं उससे नज़रें नहीं मिला पाई..।
         उस दिन के बाद से जब भी उसका ख्याल आता है, ये बात कचोटती है मेरे मन को..। काश..मैंने इतना नहीं सोचा होता..। काश..मैंने उस वक्त..सरिता की मदद की होती..। काश..मैं उस वक्त डर नहीं गई होती..।     
         सरिता यहीं रहना चाहती थी..। मेहनत करके, अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी..। कम्प्यूटर का शौक था उसे..।लैपटॉप को समझने की कोशिश करती थी..। युवा मन में ढेर सारे सपने थे..। जो उस रात टूट गए..। बमुश्किल दो तीन दिन काम किया उसके उसके बाद सरिता ने..। फिर..वापस लौट गई..अपने गांव..।
         किसी महिला के साथ हिंसा होते देखकर चुप रहना भी..हिंसा को बढ़ावा देना ही है..।
         काश..मैं चुप नहीं रही होती..।
         सॉरी सरिता..। आई एम..रियली सॉरी..।