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Saturday, October 22, 2011

तू लौटे..तो चराग़ जलें.., दियों में रौशनी लौटे..


     दो दिन पहले सरबजीत का परिवार हमारे स्टूडियो में आया..। प्रोग्राम मेरे ज़िम्मे था..सो मैं पूरा समय पीसीआर में थी..। सरबजीत की बहन, बेटी, और भाई से मुलाकात करने का मौका मिला..। बात करते-करते..बिटिया की आंख में आंसू आगए..। शादी की उम्र हो गई है उसकी..पढ़ाई पूरी होने को है..। आज तक अपने पापा के लिये तरस रही है..।
      सरबजीत को पाकिस्तान की जेल में बंद हुए इक्कीस साल गुज़र चुके हैं..। तब से उसके परिवार की खुशियां भी वहीं क़ैद हैं..। होली दीवाली..सब बेरंग-बेमतलब है उनके लिये..। इस दीवाली..उनके लिये दुआ करने को जी चाहा..। ईश्वर करे, जल्द ही उनके घर का चिराग़..घर वापस लौट आए..।


बड़ा अंधेरा है ..राह लम्बी.., चलूं तो कैसे..
मेरा उजाला..मेरा सहारा ..और हमसफर भी तू,
चला गया है, वहां ..जहां से दिखता नहीं मैं..

और जहां दीवारें भी हैं इतनी ऊंची..
भर भी लूं परवाज़..तो मेरा दम छुट जाए..
रोज़ वहीं जाकर आवाज़ लगाता हूं मैं..

वो जो कहते हैं मुझसे ..तू ना लौटेगा..
वो क्या जानें..मैं ही तू है.., कैद में जो है..
वो तू कब है.., रोज़ उन्हें समझाता हूं मैं..

रोने भी लगते हैं अक्सर..दोस्त हमारे..
कहते-कहते किस्सा..नयन बहाते धारे..
रखो हौसला.. रोज़ उन्हें बहलाता हूं मैं..

पर कब तक यूं टकराऊं मैं..दीवारों से..
रो -रो लौटूं कब तक बहरी मीनारों से..
ये भी सच है..अंधेरों से, हां , कितना घबराता हूं मैं..

तू लौटे..तो चराग़ जले..दियों में रौशनी लौटे
बिरहा की गूंगी धुन टूटे..और मिलन का राग चले..
तुझसे मिल कर रोऊं जी भर..आंसू आज बचाता हूं मैं..