Popular Posts

Friday, February 25, 2011

रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे..

रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे..
उसका आंचल फिर हुआ मैला किसी के पाप से..
  
    आंसुओं की धार से वो पाप को धोती रही..
    ढीठ निकली आत्मा इंसान की..सोती रही..

दीप लेके हाथ से पानी पे तैराता रहा..
रौशनी की आड़ में अंधेर लहराता रहा..
    
    आरती के साथ जय जयकार सब गाते रहे..
    बहती गंगा देख अपने पाप छुड़वाते रहे..

गंगा रोती रह गई..आचल भिगोती रह गई..
सब पुण्य लेजाते रहे..वो पाप ढोती रह गई..
  
     दस-पांच रुपयों में धुले..अरबों-करोड़ों पाप थे..
    रो रही थी आज फिर गंगा ज़रा सी बात पे......
                                                  
                                      





                                                                                                     27.07.10, 01:20 AM

Saturday, February 19, 2011

चेहरे.....

                                             'आज शीला को अंदर नहीं जाने देना..।
                                             सब भाई लोग सुन लो..बायकॉट करना है टोटल..।
                                             ना कोई खबर छापेगा..ना कोई टीवी पर चलाएगा '.....
....पत्रकार बुरी तरह भड़के हुए थे..। दिल्ली के राज्यपाल के घर के बाहर हंगामा हो रहा था..। शीला की कैबिनेट में फेरबदल होना था.., और प्रेस को भीतर आने से मना कर दिया गया..। 'अरे चोरों की तरह छिपते क्या हो..?' एक महिला पत्रकार चिल्लाई..' सामने आकर बात क्यों नहीं करते..?' अगर कोई गड़बड़ नहीं है.., तो मीडिया से चेहरा छिपाने की क्या ज़रूरत है..? '  'अरे भाई सब कान खोल कर सुन लो...आज किसी भी नेता की गाड़ी भीतर नहीं जाएगी..। सबको दरवाज़े पर रोका जाएगाsssss...'
                                          ऐसा महसूस हो रहा था..आज़ादी की लड़ॉई छिड़ गई है..। और आज तो सब क्रांतिकारी पत्रकार मिल कर..देश को आज़ाद करवा कर मानेंगे..। इनमें एक महिला पत्रकार का जोश देखते ही बन रहा था..। शब्दों से अपने सभी साथियों को झकझोर कर रख दिया था उसने..। मन ही मन मैं उससे इम्प्रेस भी हो रही थी..। बस...अकड़ के मारे अपने भाव व्यक्त नहीं होने दे रही थी..
                                          एक-एक कर नेताओं की गाड़ियां पहुंचने लगीं..। नेता जी के गाड़ी से उतरने से पहले सभी पत्रकार गाड़ी को घेरते..। शीशे से झांक कर..भीतर देखते । कमज़ोर ..छोटा मोटा नेता होता..तो गरियाते हुए नारेबाज़ी करते रहते..। और अगर कोई बड़ा नेता निकल आता ..तो .... ' हें हें हें....कैसे हैं सर आsssप..! देखिये ना हम लोगों को बाहर रोक कर रक्खे हुए हैं..। आप ऐसा करिये...हमारी ओर आजाइये..हें हें हें हेंssss....! नेताओं की शक्ल बदल रही थी.., और क्रांतिकारी पत्रकारों के सुर..। आखिर सीएम की गाड़ी आ पहुंची..। सब चिल्लाए...रोको रोको रोको..। मत जाने दो भीतर..। गाड़ी के रुकते ही...महिला पत्रकार लपक कर गाड़ी के दरवाज़े पर पहुंची...और झटके से दरवाज़ा खोल दिया..। पिछले एक घन्टे से वो इतने गुस्से में थी..कि मुझे समझ नहीं आरहा था..कि आगे क्या होने वाला है..। शायद वो सीएम को घसीट कर बाहर खींचने वाली थी....या फिर शायद...सीएम के मुंह पर बुलंद आवाज़ में नारा लगाने वाली थी.., या शायद..साथियों के साथ उनका घेराव करके उन्हें भीतर जाने से रोकने वाली थी..। पल भर में ही मेरे मन ना जाने कितनी कल्पनाएं कर डालीं..। मगर अगले ही पल...वो महिला पत्रकार..मुझे मुख्यमंत्री के सामने हाथ बांधे खड़ी दिखाई दी.............
                                                          अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ..। भला इतनी जल्दी..कोई कैसे रंग बदल सकता है..। ' आइये मैम...कैसी हैं आप?' आवाज़ में मानो मिश्री सी घुल गई थी..। और फिर वो खुद ...रानी को राजभवन के दरवाज़े तक छोड़ आई...!
                                                          सबके सामने बिल्कुल सामान्य खड़ी थी वो महिला पत्रकार । उसे ना इस बात से फर्क पड़ा..कि सब उसे देख रहे थे । और ना इस बात का कोई अफसोस था..कि उसने अपने आप को खो दिया है..। वैसे ...वहां मौजूद किसी भी शख्स को..उसकी हरकत से वाकई फर्क नहीं पड़ा..। वो सब भी अपनी अपनी पसंद ने नेताओं आगे खीसें निपोर रहे थे..। इसने में एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने 'सूत्रों' से बात कर के सभी पत्रकारों के प्रवेश पर लगी रोक हटवा दी..। और सभी पत्रकार..एक एक कर..भीतर जाने लगे..। थोड़ी देर पहले तक..जिस सिक्योरिटी वाले को वो महिला पत्रकार गालियां निकाल रही थी.., वही सिक्योरिटी वाला..उससे कह रहा था..'अरे मैडम आपके आई कार्ड की ज़रूरत नहीं है..। आपको तो हम जानते हैं......'
                                                          कहने के लिये बहुत कुछ है मन में..। मगर क्या लिखूं...यहां कुछ समझ में नहीं आरहा है..। बस एक गीत गूंज रहा है कानों में....
                                                         वाह री दुनिया...
                             " ऐ करवट ले सोई हक़ीकत की दुनिया...ओ दुनिया...
                              दीवानी होती तबीयत की दुनिया..ओ दुनिया..
                              ख्वाहिश में लिपटी ज़रूरत की दुनिया..ओ दुनिया रे...
                              है इंसां के सपनों के नीयत की दुनिया...ओ दुनिया...
                              ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया... "

    


Thursday, February 10, 2011

नेता जी का भोज....

            'अरे यार..चमचे खतम हो गए हैं..'। नेता जी के भोज में बुफे टेबल के पास से आवाज़ सुनाई पड़ी, तो खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं सकी। 'मैडम आपने खाना खाया..?' हाथ जोड़ कर..बड़ी नम्रता से नेता जी ने मुझसे सवाल किया। दिल्ली दरबार के आंगन में नेता जी ने नए साल का भोज रखा था। रानी समेत..सारे दरबारी आमंत्रित थे। पत्रकारों को भी न्यौता मिला था। यहां दिल्ली के वो सारे 'खास' लोग मौजूद थे, जो अपने माथे पर 'आम आदमी' लिख कर घूमते हैं। रेमन्ड्स की शर्ट पर, खादी जैकेट वाले नेता भी, और डिज़ाइनर घड़ी पहन कर वक्त बदलने की बातें करने वाले पत्रकार भी..। 
              ऐसे माहौल से परिचय का मेरा ये पहला मौका था। कुछ देर लगी समझने में..। मगर फिर , सब कुछ साफ-दिखाई देने लगा। अलग-अलग टेबलों पर, अलग-अलग किस्म की चर्चाएं थीं..। 'और भाई..क्या हाल चाल हैं..?' 'अरे आपसे क्या छिपा है..ही ही ही।' 'आती गर्मी में पानी की समस्या पर भी सवाल कर लेना' 'अपनी आईडी भी लगा दो यार बीच में..!' 'भई नेता जी..आपने काम नहीं करवाया मेरा..' वगैरह वगैरह..। 
             बड़ी-बड़ी गम्भीर बातों को हंस कर टाल देने वाले लोग, हंसी-हंसी में बड़ी गम्भीर बातें कर रहे थे..। पता नहीं इनमें से देश के काम क्या आने वाला था। मगर वहां मौजूद हर शख्स, अपना कोई ना कोई काम बनाने के जुगाड़ में था। जिनके सम्बन्ध विशेष थे, वो सीना तान कर फेवर ले रहे थे। और जिनके ताल्लुक भोज तक सीमित थे, वो सीढ़ियां बना रहे थे। 
             मुस्कुरा सब रहे थे। और हर मुस्कुराहट का अलग मतलब था। तेज़ धूप में सफेद इमारत भी चमक रही थी। और वहां मौजूद ज़्यादातर लोगों के चेहरे भी साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। अगर कुछ नहीं दिखाई दे रहा था..तो वो था.. आम आदमी। जिसका नाम .. किसी के निमन्त्रण की लिस्ट में नहीं होता। 
             
             
             
             


Tuesday, February 8, 2011

सरिता के पंख...

ह्म्म्म्म्म्म्...
तो..आज का दिन भी खत्म हो गया..। आज नींद भी जल्दी आने लगी थी..। मगर सोने में रोज़ से भी ज़्यादा देरी हो गई है..।  शायद थकान ज़्यादा हो गई है आज..।  सुबह छह बजे से लेकर..रात के साढ़े आठ बजे तक, एक भी पल चैन का नहीं मिला..। अगर सरिता ना होती..तो शायद घर का खाना भी नसीब ना होता ।
                                  सरिता..मेरी जादू की छड़ी..। मेरा सुबह का अलार्म..। सरिता ना हो तो मेरा ना जाने क्या हो..। मेरे घर पर काम करती है सरिता..। सुबह-सुबह उसकी डोर बेल से ही मेरी आंख खुलती है रोज़..।  मुझसे नौ साल छोटी है, मगर शादी को पांच साल हो चुके हैं..! प्यारी सी नेपाली लड़की है..। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार..। थोड़ी पागल है..। मेरी हर बात को..नेपाली में गुनगुनाने लगती है..। मुझे भाषा समझ में नहीं आती..मगर वो गाती अच्छा है..। मेरे तैयार होने तक..घर का सारा काम निपटाती है..। मैं वक्त पर दफ्तर के लिये निकल जाऊं..इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसी के सर होती है..। जिसे वो बखूबी निभाती है..। कभी कभार..मुझे बाल बनाते हुए गौर से देखती है..। आइने के सामने..मेरे पीछे खड़ी हो जाती है.., मायूस चेहरा लेकर..। कहती है- ' दीदी, मैं बहुत रोई..। मगर इतना छोटी सी का सादी बना दिया मेरे मां-बाप ने..। हमारे गांव में बऊऊत जल्दी सादी कर देते दीदी..।'
                                मैं...और सरिता.., दो कामकाजी लड़कियां..। दोनों स्वावलंबी..। दोनों आजीविका के लिये घऱ से दूर..परदेस में..। मगर दोनों की ज़मीन अलग..। दोनों के आसमान भी अलग..और उड़ान भी..। सरिता के पंख..बहुत पहले तोड़ दिये गए..। देर तक मेरे यहां बैठी रहती है..। काम खत्म होने के बाद..कभी कभी टीवी देखने लगती है..। और हीरो के डायलॉग बोल कर सुनाती है..। और कभी- कभी..चुप चाप देखती रहती है मुझे..।मानो अपने को आसमान को देख रही हो..। छटपटाई सी..हालात से बेबस..और नाराज़..। नेपाली में मायके की याद का गीत गुनगुनाने लगती है..।
एक दिन काम करते करते अचानक बोली - ' आज मेरा मरद से लराई हो गया दीदी..।'  
' क्यों?'
' मईइइ कुछ बोली...वो माना नईईई...तो मैं गुस्सा हो गया..। वो मेरे को सॉरी बी बोला दीदी..। पर मैं नई मानी..। आज में जल्दी चली जाऊं..? कमरे का चाबी बी नई छोड़ के आई मईई । दीदी मैं जाऊं..???? '
....................... सरिता चली जाती है रोज़..। और रोज़.....मुझे सोच में डाल जाती है..।
                                         सरिता के कसूरवारों पर गुस्सा आता है..। पर मैं भी कुछ नहीं कर सकती..। न तो उसका आसमान बदल सकती हूं.., न उसके पंखों में परवाज़ भर सकती हूं..। तो सोचा..क्यों ना सरिता को आप सब से मिलवाया जाए..। सरिता उड़ नहीं सकती तो क्या..हमारा आसमान..ज़रा देर के लिये उसकी ओर झुक तो सकता है ना..। परवाज़ ना सही..पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज़ ही सही..। पांव पत्थर के सही,  नज़र के दू.....र तलक देख सकने का एहसास ही सही..। बूंद दो बूंद से प्यास नहीं बुझेगी..जानती हूं। मगर..भरपूर प्यास भी..ज़िन्दा होने का ही सबूत होती है..।
बह जाने दो इस सरिता को....

                                                               ..                  
          


                               
ह्म्म्म्म्म्म्...
तो..आज का दिन भी खत्म हो गया..। आज नींद भी जल्दी आने लगी है..। शायद थकान ज़्यादा हो गई है आज..।  सुबह छह बजे से लेकर..रात के साढ़े आठ बजे तक, एक भी पल चैन का नहीं मिला..। अगर सरिता ना होती..तो शायद घर का खाना भी नसीब ना होता ।
                                  सरिता..मेरी जादू की छड़ी..। मेरा सुबह का अलार्म..। मेरी सहेली...मेरी दादी..या फिर कह सकते हैं दाई मां..!!! सरिता ना हो तो मेरा ना जाने क्या हो..। मेरे घर पर काम करती है सरिता..। मुझसे नौ साल छोटी है, मगर शादी को पांच साल हो चुके हैं..! सुबह-सुबह उसकी डोर बेल से ही मेरी आंख खुलती है रोज़..। प्यारी सी नेपाली लड़की है..। अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार..। थोड़ी पागल है..। मेरी हर बात को..नेपाली में गुनगुनाने लगती है..। मुझे भाषा समझ में नहीं आती..मगर वो गाती अच्छा है..। मेरे तैयार होने तक..घर का सारा काम निपटाती है..। मैं वक्त पर दफ्तर के लिये निकल जाऊं..इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उसी के सर होती है..। जिसे वो बखूबी निभाती है..। कभी कभार..मु
                               

Monday, February 7, 2011

जंगलियों की भीड़...

                           '..स्स्स्सा...ले..!  तुझे समझ में नहीं आता एक बार में..? 
                            मैं तेरी...$#@#%%*)(_))(*(&&^$%$@....!!!..' 
एक स्कूल जाते बच्चे के मुंह से सुबह-सुबह ये अल्फाज़ सुन कर कैसा लगा होगा..? मेरी कॉलोनी के बाहर..एक फूल वाला बैठता है..। स्कूल यूनिफ़ॉर्म में कुछ बच्चे सुबह-सुबह उससे फूल खरीद रहे थे..। रोज़-डे पर शायद किसी क्लासमेट को देने के लिये..। पता नहीं किस बात पर उलझ पड़े..! मगर शुक्र है..फौरन शान्त भी हो गए। दो कदम चली...तो लाल बत्ती के नज़दीक..खून से सना एक शख्स..कभी रिक्शा वाले..तो कभी ऑटो वाले से बिठा लेने की प्रार्थना कर रहा था..। उसे देख कर अंदाज़ा हो रहा था.., कि रात किसी से मारपीट हुई है उसकी..। कान और चेहरे पर लगा खून..सूख गया था..। शायद रात भऱ कहीं बेहोश पड़ा रहा वो..। मगर कोई भी रिक्शा वाला..या ऑटो वाला..उसे बिठाने को तैयार नहीं हुआ..। सब डर रहे थे..। कहीं मदद करते-करते..लेने के देने न पड़ जाएं..। 
                          ऐसा लगा..जैसे..कॉलोनी के बाहर खड़े बच्चों का ही भविष्य..आगले मोड़ पर टकरा गया..। बड़ी डरावनी कल्पना थी..। काश...कभी सच न हो..। 
                         ऑफिस से लौटने में आज देर हो गई..। मेट्रो..पच्चीस मिनट देरी से चल रही थी..। बाहर तेज़ बारिश..और अंदर भयंकर भीड़..। साधारण बोगी से फैलते-फैलते.., पुरुषों का रेला..महिला कंपार्टमेंट तक आ पहुंचा था..। पता नहीं किस महिला ने..पुलिस को फोन करके शिकायत कर दी..। उसे महिला कंपार्टमेंट में पुरुषों का खड़ा होना नापसंद था..। और थोड़ी ही देर में ., कुछ पुलिस वाले..पुरुषों को निकालने के लिये डब्बे में चढ़े..। खूब बहस हुई..। और लोगों ने लगभग धकेल कर.पुलिस वालों को..बोगी से नीचे उतार दिया..। उतनी देर तक..न मेट्रो सरकी.., न ही आवाज़ें शांत हुईं..।  
                         आज के दिन की शुरुआत..और अंत..दोनों ही अजीब से थे..। अशांत..। ऐसे लग रहा था..मानो.., आने वाला कल..चेतावनी दे रहा है..। सभ्यता क्या उलटी दिशा में बढ़ रही है..? जंगलों से निकल कर..इंसान कंकरीट के जंगलों में बसने लगा ..। मगर फितरत नहीं बदली..। जंगलीपना नहीं गया..। ज़रा-ज़रा सी बात पर..अंदर का जानवर, बाहर निकल पड़ता है..। इंसान होना काफी मुश्किल है शायद..। 
                        मेट्रो की उसी बोगी में.., मेरी बगल वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी..। मेरे साथ-साथ..उसे भी ये बात नहीं भाई थी.., कि इतनी भीड़..और खराब मौसम की स्थिति में..,महिला बोगी के किनारे खड़े हो कर घर पहुंचने की कोशिश करते पुरुषों को यात्रा न करने दी जाए..। उसी बोगी में थोड़ी देर बाद..एक नेत्रहीन युवक चढ़ा..। किसी तरह खुद को संभालने की कोशिश करते उस युवक को देख कर..वो लड़की फौरन उठी..। बांह पकड़ कर उसे लाई..और अपनी सीट पर बिठा कर खुद खड़ी हो गई..। जंगलियों की भीड़ में ..दिन भर में यही एकमात्र इंसान टकराई थी मुझसे ..। चलो..कम से कम..उम्मीद तो बरकरार है..। रात के एक बज कर पच्चीस मिनट हो गए हैं..। मुझे लगता है..सोने की कोशिश करनी चाहिये..। कल वसंत पंचमी है..। देखें..कल ज़िन्दगी..क्या नया रंग दिखाती है..। 

Sunday, February 6, 2011

कहिये..तो कमाल का कहिये..

कभी कभी बहुत सी बातें हम सिर्फ इसलिये कह देते हैं..क्योंकि हमें लगता है कि..हम क्या कमाल का कहते हैं..। इसीलिये.. कोई सुने न सुने.., हम तो बस कह के रहते हैं ..! क्या करूं..आदत से मजबूर हूं..। क्या पता ..कभी कोई एक आध श्रोता मिल ही जाए। इसीलिये..मैं भी कहूंगी ज़रूर..।
लाखों की भीड़ में मुझे उन लोगों की तलाश है..,जो ये ज़रा कम सोचें..कि ज़्यादातर लोग क्या सोचते हैं..। और अपनी अलग सोच को..जो बिना झिझके..बिना डरे..सारी दुनिया से बांट सकें..। यकीन कीजिये..जो लोग ऐसा कर पाते हैं.., कमाल भी अक्सर वही लोग किया करते हैं..। सभी मित्रगण.., इस पन्ने पर अपनी बात कहने के लिये आमन्त्रित हैं..। मुझे यकीन है कि..बातों बातों में..कोई न कोई कमाल की बात निकल कर ज़रूर आएगी....

क्यों नहीं..???

आज बड़े दिनों बाद लिखने बैठी हूं..। की-बोर्ड पर उंगलियां चल तो रही हैं..मगर रुक-रुक कर..। मन में इतना कुछ एक साथ उमड़ रहा है कि..कहां से शुरू करूं..समझ में नहीं आता..।

ठीक है..सबसे पहले..सबसे आखिरी बात से शुरू करती हूं..। दिन खत्म हो चुका है..। तारीख बदल रही है..। ठीक बारह बजे हैं..। सोच रही हूं..अब तक ज़िन्दगी में मैंने किया क्या है..? पापा के पैसों से पढ़ाई की..। फिर पापा के पैसों से ही..स्ट्रगल पीरियड पूरा किया..। अब ठीक-ठाक परिस्थितियां हैं..मगर पापा के बगैर..अब भी, मैं एक कदम नहीं चल सकती..। कभी कभी लगता है..उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी..। अगर लड़का होती.., तो शायद..मुझे इसके लिये माफी नहीं मिलती..। और ये एक बड़ी वजह है कि.., मैं., और मेरे जैसी बहुत सी लड़कियां..कभी कुछ करने की कोशिश ही नहीं करतीं..क्योंकि..उन पर अक्सर कोई ज़िम्मेदारी डाली ही नहीं जाती..!
              जब तक मां -बाप के घर पर हैं..तब तक सिर्फ पढ़ाई पूरी करना..और घर के काम काज सीख लेना ही..उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल होता है..। हमारी बेटी एमबीए है.., ये बात लड़के वालों से कहने में अच्छी लगती है; सिर्फ इसीलिये..बेटी को एमबीए बना लेना है..। डॉक्टर है..तो और भी अच्छा वर मिलेगा..। मगर..बस यहीं तक..। इसके आगे..न तो परिवार की सोच जाती है..न ही लड़की के सपने..। जाने अनजाने..वो भी अपना हर सपना..इसी सपने से जोड़ कर देखने लगती है..। खुद के लिये न तो कोई अरमान होते हैं.., न जज़्बा..। ता-ज़िन्दगी..उसे इस बात का एहसास तक नहीं होता..। और जिन्हें एहसास होता है.., उनकी ज़िन्दगी..इसकी कीमत चुकाते चुकाते खत्म हो जाती है..।
हां ये सच है कि..दुनिया भर में सफल काम काजी महिलाओं की भऱमार है..। मगर उनमें ऐसी कितनी हैं..जो अपने सपनों को पूरा करने के लिये काम करती हैं..?  तकरीबन आधी तो ऐसी हैं, जो मजबूर हैं..। घर खर्च में हाथ बंटाने के लिये उन्हें काम करना पड़ता है..। और बाकि बची आधी में से, लगभग साठ प्रतिशत ऐसी हैं.., जिन्हें अपने अस्तित्व से मिलना तक नहीं है..।वो जहां हैं..जैसी हैं..खुश हैं..। और इसमें कसूर इनका नहीं.., बल्कि उस पहली बात का है.., जो मां-बाप..अपने बच्चे को गोद में उठा कर कहा करते हैं..। गोद में बेटा हो..तो मां बाप कहते हैं..बेटा खूब पढ़ लिख..। घर परिवार का नाम रौशन कर..। और अगर गोद में बेटी हो..तो..मेरी बेटी परी है..। एक दिन राजकुमार आएगा.., और तुझे डोली में बिठा के ले जाएगा..। जिस दिन..ये पहली बात..बेटे और बेटी के लिये एक जैसी होने लगेगी.., उस दिन से भविष्य संवरने लगेगा..।
मेरी बात थोड़ी अटपटी ज़रूर है..। पर फिर भी..कहूंगी ज़रूर..। शायद..कुछ और लोग भी हों..जो मेरी ही तरह अटपटा सोचने की हिमाकत करते हों..! और मेरा ख़याल है कि..मुझे भी अब सोने की कोशिश करनी चाहिये..सुबह मुझे भी भी तो ऑफिस जाना है..