आज बड़े दिनों बाद लिखने बैठी हूं..। की-बोर्ड पर उंगलियां चल तो रही हैं..मगर रुक-रुक कर..। मन में इतना कुछ एक साथ उमड़ रहा है कि..कहां से शुरू करूं..समझ में नहीं आता..।
ठीक है..सबसे पहले..सबसे आखिरी बात से शुरू करती हूं..। दिन खत्म हो चुका है..। तारीख बदल रही है..। ठीक बारह बजे हैं..। सोच रही हूं..अब तक ज़िन्दगी में मैंने किया क्या है..? पापा के पैसों से पढ़ाई की..। फिर पापा के पैसों से ही..स्ट्रगल पीरियड पूरा किया..। अब ठीक-ठाक परिस्थितियां हैं..मगर पापा के बगैर..अब भी, मैं एक कदम नहीं चल सकती..। कभी कभी लगता है..उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी..। अगर लड़का होती.., तो शायद..मुझे इसके लिये माफी नहीं मिलती..। और ये एक बड़ी वजह है कि.., मैं., और मेरे जैसी बहुत सी लड़कियां..कभी कुछ करने की कोशिश ही नहीं करतीं..क्योंकि..उन पर अक्सर कोई ज़िम्मेदारी डाली ही नहीं जाती..!
जब तक मां -बाप के घर पर हैं..तब तक सिर्फ पढ़ाई पूरी करना..और घर के काम काज सीख लेना ही..उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल होता है..। हमारी बेटी एमबीए है.., ये बात लड़के वालों से कहने में अच्छी लगती है; सिर्फ इसीलिये..बेटी को एमबीए बना लेना है..। डॉक्टर है..तो और भी अच्छा वर मिलेगा..। मगर..बस यहीं तक..। इसके आगे..न तो परिवार की सोच जाती है..न ही लड़की के सपने..। जाने अनजाने..वो भी अपना हर सपना..इसी सपने से जोड़ कर देखने लगती है..। खुद के लिये न तो कोई अरमान होते हैं.., न जज़्बा..। ता-ज़िन्दगी..उसे इस बात का एहसास तक नहीं होता..। और जिन्हें एहसास होता है.., उनकी ज़िन्दगी..इसकी कीमत चुकाते चुकाते खत्म हो जाती है..।
हां ये सच है कि..दुनिया भर में सफल काम काजी महिलाओं की भऱमार है..। मगर उनमें ऐसी कितनी हैं..जो अपने सपनों को पूरा करने के लिये काम करती हैं..? तकरीबन आधी तो ऐसी हैं, जो मजबूर हैं..। घर खर्च में हाथ बंटाने के लिये उन्हें काम करना पड़ता है..। और बाकि बची आधी में से, लगभग साठ प्रतिशत ऐसी हैं.., जिन्हें अपने अस्तित्व से मिलना तक नहीं है..।वो जहां हैं..जैसी हैं..खुश हैं..। और इसमें कसूर इनका नहीं.., बल्कि उस पहली बात का है.., जो मां-बाप..अपने बच्चे को गोद में उठा कर कहा करते हैं..। गोद में बेटा हो..तो मां बाप कहते हैं..बेटा खूब पढ़ लिख..। घर परिवार का नाम रौशन कर..। और अगर गोद में बेटी हो..तो..मेरी बेटी परी है..। एक दिन राजकुमार आएगा.., और तुझे डोली में बिठा के ले जाएगा..। जिस दिन..ये पहली बात..बेटे और बेटी के लिये एक जैसी होने लगेगी.., उस दिन से भविष्य संवरने लगेगा..।
मेरी बात थोड़ी अटपटी ज़रूर है..। पर फिर भी..कहूंगी ज़रूर..। शायद..कुछ और लोग भी हों..जो मेरी ही तरह अटपटा सोचने की हिमाकत करते हों..! और मेरा ख़याल है कि..मुझे भी अब सोने की कोशिश करनी चाहिये..सुबह मुझे भी भी तो ऑफिस जाना है..
ठीक है..सबसे पहले..सबसे आखिरी बात से शुरू करती हूं..। दिन खत्म हो चुका है..। तारीख बदल रही है..। ठीक बारह बजे हैं..। सोच रही हूं..अब तक ज़िन्दगी में मैंने किया क्या है..? पापा के पैसों से पढ़ाई की..। फिर पापा के पैसों से ही..स्ट्रगल पीरियड पूरा किया..। अब ठीक-ठाक परिस्थितियां हैं..मगर पापा के बगैर..अब भी, मैं एक कदम नहीं चल सकती..। कभी कभी लगता है..उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी..। अगर लड़का होती.., तो शायद..मुझे इसके लिये माफी नहीं मिलती..। और ये एक बड़ी वजह है कि.., मैं., और मेरे जैसी बहुत सी लड़कियां..कभी कुछ करने की कोशिश ही नहीं करतीं..क्योंकि..उन पर अक्सर कोई ज़िम्मेदारी डाली ही नहीं जाती..!
जब तक मां -बाप के घर पर हैं..तब तक सिर्फ पढ़ाई पूरी करना..और घर के काम काज सीख लेना ही..उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल होता है..। हमारी बेटी एमबीए है.., ये बात लड़के वालों से कहने में अच्छी लगती है; सिर्फ इसीलिये..बेटी को एमबीए बना लेना है..। डॉक्टर है..तो और भी अच्छा वर मिलेगा..। मगर..बस यहीं तक..। इसके आगे..न तो परिवार की सोच जाती है..न ही लड़की के सपने..। जाने अनजाने..वो भी अपना हर सपना..इसी सपने से जोड़ कर देखने लगती है..। खुद के लिये न तो कोई अरमान होते हैं.., न जज़्बा..। ता-ज़िन्दगी..उसे इस बात का एहसास तक नहीं होता..। और जिन्हें एहसास होता है.., उनकी ज़िन्दगी..इसकी कीमत चुकाते चुकाते खत्म हो जाती है..।
हां ये सच है कि..दुनिया भर में सफल काम काजी महिलाओं की भऱमार है..। मगर उनमें ऐसी कितनी हैं..जो अपने सपनों को पूरा करने के लिये काम करती हैं..? तकरीबन आधी तो ऐसी हैं, जो मजबूर हैं..। घर खर्च में हाथ बंटाने के लिये उन्हें काम करना पड़ता है..। और बाकि बची आधी में से, लगभग साठ प्रतिशत ऐसी हैं.., जिन्हें अपने अस्तित्व से मिलना तक नहीं है..।वो जहां हैं..जैसी हैं..खुश हैं..। और इसमें कसूर इनका नहीं.., बल्कि उस पहली बात का है.., जो मां-बाप..अपने बच्चे को गोद में उठा कर कहा करते हैं..। गोद में बेटा हो..तो मां बाप कहते हैं..बेटा खूब पढ़ लिख..। घर परिवार का नाम रौशन कर..। और अगर गोद में बेटी हो..तो..मेरी बेटी परी है..। एक दिन राजकुमार आएगा.., और तुझे डोली में बिठा के ले जाएगा..। जिस दिन..ये पहली बात..बेटे और बेटी के लिये एक जैसी होने लगेगी.., उस दिन से भविष्य संवरने लगेगा..।
मेरी बात थोड़ी अटपटी ज़रूर है..। पर फिर भी..कहूंगी ज़रूर..। शायद..कुछ और लोग भी हों..जो मेरी ही तरह अटपटा सोचने की हिमाकत करते हों..! और मेरा ख़याल है कि..मुझे भी अब सोने की कोशिश करनी चाहिये..सुबह मुझे भी भी तो ऑफिस जाना है..
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