पत्रकार..सच्चा ..या झूठा..?मीडिया...खरा..या खोटा.?चिराग...आग या कालिख.?रौशनी की बात नहीं करेंगे हम.इस चिराग तले अँधेरे ही अँधेरे हैं...भटकाव ही भटकाव है.इन्टरनेट पर ख़बरों की दुनिया में..मीडिया की ख़बरों से जुड़े पन्नों की भरमार है.इन पर..खबरनवीसों की खबर ली जाती है..पोल खोली जाती है.कहीं सच्ची होती है..कहीं कहीं..दिल का गुबार निकलने का जरिया बन जाते हैं ये पन्ने.खैर...हमारा पन्ना ..ऐसा कुछ नहीं करने वाला.इस सुब का zikra यहाँ करने का मकसद..सिर्फ ये है..की शुरुआत..समाज के उस हिस्से की बात से की जाये..jise लोकतंत्र का चौथा सतम्भ माना जाता है.
आदर्शों की बात करने वालों को अब पागल करार दे दिया जाता है. पर क्या..आदर्शों पर चलना इतना मुश्किल होता है..की हम सब कुछ जानते बूझते हुए..गलत रास्ते को इख्तियार कर लें..! ऐसा करके..हम शायद खुद को समझदार...और प्रक्टिकल साबित करने की कोशिश करते है. यही मानसिकता..इस चौथे स्तम्भ की दरार है.और ये दरार..धीरे धीरे..चौड़ी होती जारही है. इसके दोनों तरफ..जो लोग हैं..वो जी जान से इसे और गहरा करने में जुटे हैं.उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.. की एक दिन ये दरार चौड़ी होते होते ...इस स्तम्भ को गिरा देगी.क्योकि वो जानते है की वो स्तम्भ पर नही बल्कि एक सामानांतर सीढ़ी पर खड़े हैं..जो सत्ता, ताक़त और धन की इमारत तक ले जाती है. हम क्या कर सकते हैं..?हमारे पास कोई हल है क्या..?क्या आपके पास कोई हल है..?शायद..नहीं.
मगर फिर भी..हम कहेंगे ज़रूर.., क्यूंकि कह देना ज़रूरी है.कहेंगे ..तभी तो सुना जायेगा..!वो न सुन सकें..जो जिनकी बात हो रही है..तो क्या.., वो तो सुन सकेंगे..जिन पर..इस दरार की रेत...भुर भुर कर गिर रही है.
गुंजन
मेरे अंजाम की तू फिक्र न कर, आग बढ़ा रात को चीर के इस बार सुबह उगा दें चलो.. एक भी क़तरा समंदर में अगर बाकी हो, बात मोती की करो यार..सर उठा के चलो -
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