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Saturday, September 24, 2011

'ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं'

                                               

  'ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं', अक्सर ऐसी चेतावनियां लिखी हैं मैंने कई कहानियों पर..। कुछ तस्वीरें इतनी भयानक होती हैं, कि उन्हें छंटनी करके, अलग कर देना पड़ता है..। या फिर, उन पर धुंधली परत चढ़ाई जाती है..। लेकिन इस छंटनी के दौरान, उस सारी तस्वीरों को देखना..,, बार-बार देखना..,, मेरी मजबूरी होती है..। घर लौटने के बाद, अक्सर वो तस्वीरें याद आने लगती हैं.., मन बड़ा खराब होने लगता है..।
                        
         आज भी अजीब-सा मन हो रहा है ..। कुछ डिप्रेशन सा है ..। दरअसल, ये कल से ही है..। उसी वक्त से, जब से गुड़गांव के टोल पर सीसीटीवी में कैद हत्या का वीडियो देखा । देखा ही नहीं, दफ्तर के साथियों को बुला-बुला कर दिखाया भी..। कहां गोला लगाना है - कहां तीर.., ये भी समझाया..। देखा मैंने.., खिड़की के बाहर से जब गोली चली, उसकी चमक काले शीशे की पीछे से कैसे कौंधी..!,, फिर कैसे उमेश की कमीज़ खून से सन गई, और वो ज़मीन पर गिर पड़ा..। आंख बंद करती हूं, तो वही तस्वीर याद आती है बार-बार । और उसके साथ , हर वो तस्वीर याद आरही है, जिस पर मैंने कभी ना कभी -  ' विचलित कर सकती है'-  की चेतावनी लिखी है..।
           दुनिया की बुरी से बुरी ख़बरें, सबसे पहले खुद सुनो, खुद लिखो..। ऐसे लिखो , कि देखने वाले को, उससे भी ज़्यादा बुरा लगे..। इतना बुरा लगे, कि उसे आपका ही चैनल, सबसे अच्छा लगने लगे..!!  इस सबके दौरान, कभी कभी लगता है, हमारे भीतर का इनसान, मरने लगा है। हर संवेदना को हम पहले ख़बर के तौर पर आंकते हैं..। खुद क्या महसूस किया, इसके लिये तो फुर्सत ही नहीं मिलती। कल एक वरिष्ठ ने कहा, पत्रकार की जिन्दगी में तो तीन ही मेले होते हैं । पहला - इलेक्शन, दूसरा- मौत, और तीसरा- बम धमाका ..। मैं शायद पत्रकारों की जमात में कभी पूरी तरह फिट ना हो पाऊं..! पता नहीं कौन ज़्यादा निष्ठुर है, सत्ताइस रुपए के लिये क़त्ल करने वाला, या , फिर, सत्ताइस घन्टों तक उस क़त्ल को बेचने वाला..।
          मानती हूं, कि गड्ढे की ओर इशारा करने वाला, दरअसल, आपको बचाने की कोशिश कर रहा होता है। ठीक उसी तरह,  गुनाह की तस्वीरें दिखाने का मकसद भी, गुनाह को मारना ही होता है। पर आपको नहीं लगता कि , कभी-कभी हम सचमुच , हद पार कर देते हैं..? 
          ये भी जानती हूं, कि , मेरा ये सवाल बेमानी सा है..। ठीक उसी तरह, जैसे ये जानती हूं, कि कल फिर ऐसी ही किसी तस्वीर से मेरा सामना होगा..। फिर मैं उसे सजा-संवार कर तैयार करूंगी.., गोला-तीर लगा कर, दर्शकों के लिये परोस दूंगी..। लेकिन फिर भी, ये सब कहने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं..। ये मेरा काम है, मगर पता नहीं क्यों.., ये तस्वीरें, मेरे मन को विचलित कर देती हैं..।