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Saturday, September 17, 2011

शराबी की चप्पल

              रात के डेढ़ बजे। आईएसबीटी से आज़ादपुर की ओर आने वाली रोड। ये कल की बात है। तेज़ बारिश के बाद धुल-धुली सड़क पर ऑफिस की गाड़ी दौड़ रही थी..। तभी अचानक, एक मोड़ के पास, डिवाइडर पर नज़र गई..। डिवाइडर पर खड़ा एक शराबी..अपने से पंद्रह इंच दूर रखी चप्पल पहनने की नाकाम कोशिश कर रहा था। कभी पांव दांई ओर चला जाता..कभी बाईं ओर..!
              पल भर में हमारी गाड़ी उसे क्रॉस करके आगे निकल आई। पर मैं उस नज़ारे को भूल नहीं पा रही हूं। पता नहीं क्यों, मगर उस तस्वीर में मुझे हिन्दुस्तानी सियासत का चेहरा दिखाई दिया..। ऐसे ही तो हैं हमारे सियासी रहनुमा, सत्ता के नशे में चूर..! आम आदमी की छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान, इनसे कुछ ही इंच की दूरी पर होते हैं.., लेकिन, ये लोग कभी दाएं जाते हैं..कभी बाएं..।   
            मुझे पता है..वो शराबी..रात भर अपनी चप्पल नहीं पहन पाया होगा..। इसी तरह हमारे नेता भी, कभी हमारी समस्याओं का हल नहीं निकाल पाएंगे..। फिर चाहे वो ग्राम यात्रा करने वाले जूनियर गांधी हों, या फिर, उपवास पर बैठे मोदी..।
देश में आज भी 80 प्रतिशत लोग एक या दो वक्त का उपवास रखते हैं। ये वो लोग हैं जिनकी आमदनी रोज़ाना बीस रुपए से ज़्यादा नहीं है। मोदी जी, क्या छह करोड़ का ये उपवास, सचमुच उन्हीं लिये है..?
           
सर पर मिट्टी ढोती इस महिला की रोज़ी-रोटी, आज भी इसी मज़दूरी से चलती है..। इस तस्वीर से किसी को कुछ मिला, तो वो थे सिर्फ राहुल गांधी। 
              छह करोड़ से ज़्यादा खर्च करके, सद्भावना मंच नहीं, 2014 की सीढ़ी तैयार की गई है। कुछ-कुछ वैसी ही, जैसी राहुल , गांव -देहात में सर पर मिट्टी ढो कर तैयार करते रहे हैं। अफसोस तो ये है कि, हम आम लोग, इन नेताओं के लिये सीढ़ी से ज़्यादा कुछ भी नहीं हैं..। 
              लोकल ट्रेन में , राशन की लाइन में, बारिश के बाद सड़क पर गड्ढे में फंसे पहिये से जूझते वक्त.., हम सरकार और सिस्टम को लाख कोसते हैं..। पर जानते हैं..कि कुछ नहीं बदलने वाला..। कल फिर इसी लोकल ट्रेन की भीड़ में जगह बनानी है.., राशन की लाइन में खड़ा होना है..और इसी सड़क पर से हो कर दफ्तर..स्कूल..और अस्पताल जाना है..। फिर भी, हम कहते ज़रूर हैं..क्योंकि कहने से मन की भड़ास निकल जाती है..।
           

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