अखबारों में छपी तस्वीरों के देख कर हम भावुक हो जाते हैं..। फिर अखबार फोल्ड करके रख देते हैं, और गर्मा-गर्म नाश्ते की महक में खो जाते हैं। |
दो दिन पहले दिल्ली ने सिलसिलेवार बम धमाकों की तीसरी बरसी मनाई..। कुछ दिनों बाद, 26/11 की बरसी मनाई जाएगी..। फिर अगले साल, दिल्ली हाइकोर्ट आतंकी वारदात की बरसी आ जाएगी..। बरसियों की फेहरिस्त में दहशतगर्द , हर महीने नयी एंट्री जोड़ रहे हैं..। हम क्या सिर्फ शोक ही मनाते रह जाएंगे..?
25 मई को दिल्ली हाइकोर्ट के बाहर धमाका, 13 जुलाई को मुंबई पर हमला, 7 सितंबर को दिल्ली फिर निशाने पर..। हर बार साज़िश पहले से ज़्यादा खतरनाक, हर बार नुकसान..पहले से ज़्यादा..। अगली सुबह अखबार में खबर छपती है..तस्वीरों के साथ। तस्वीरें देख कर हम भावुक हो जाते हैं..। फिर अखबार फोल्ड करके रख देते हैं, और गर्मा-गर्म नाश्ते की महक में खो जाते हैं।
वो जो ज़ेड सुरक्षा के घेरे में रहते हैं.., आम आदमी की दहशत का मतलब नहीं समझते..। डर के मारे रात भर जागना क्या होता है..उन्हें नहीं पता..। काम पर गए बेटे के वापस ना लौटने का डर जिस दिन इनकी समझ में आ जाएगा, शायद उस दिन वो, वैसा जवाब ना दें..जैसा पिछले हफ्ते गृहमंत्री ने दिया..।
फिलहाल तो सच्चाई ये है .., कि आज तक हम ना तो किसी भी आतंकी हमले के गुनाहगार को सज़ा दिला पाए हैं.., ना ही आम आदमी को सुरक्षा का भरोसा मिला है..। बरस पर बरस बीत रहे हैं...हम बरसियों पर बरसियां मना रहे हैं..। गाहे-ब-गाहे पाकिस्तान को कोस कर अपने मन को तसल्ली सी दे लेते हैं..। तसल्लियों और बरसियों के आदि होते जा रहे देश को ..बस एक सच्ची कोशिश का इंतज़ार है..।
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