'आज शीला को अंदर नहीं जाने देना..।
सब भाई लोग सुन लो..बायकॉट करना है टोटल..।
ना कोई खबर छापेगा..ना कोई टीवी पर चलाएगा '.....
....पत्रकार बुरी तरह भड़के हुए थे..। दिल्ली के राज्यपाल के घर के बाहर हंगामा हो रहा था..। शीला की कैबिनेट में फेरबदल होना था.., और प्रेस को भीतर आने से मना कर दिया गया..। 'अरे चोरों की तरह छिपते क्या हो..?' एक महिला पत्रकार चिल्लाई..' सामने आकर बात क्यों नहीं करते..?' अगर कोई गड़बड़ नहीं है.., तो मीडिया से चेहरा छिपाने की क्या ज़रूरत है..? ' 'अरे भाई सब कान खोल कर सुन लो...आज किसी भी नेता की गाड़ी भीतर नहीं जाएगी..। सबको दरवाज़े पर रोका जाएगाsssss...'
ऐसा महसूस हो रहा था..आज़ादी की लड़ॉई छिड़ गई है..। और आज तो सब क्रांतिकारी पत्रकार मिल कर..देश को आज़ाद करवा कर मानेंगे..। इनमें एक महिला पत्रकार का जोश देखते ही बन रहा था..। शब्दों से अपने सभी साथियों को झकझोर कर रख दिया था उसने..। मन ही मन मैं उससे इम्प्रेस भी हो रही थी..। बस...अकड़ के मारे अपने भाव व्यक्त नहीं होने दे रही थी..
एक-एक कर नेताओं की गाड़ियां पहुंचने लगीं..। नेता जी के गाड़ी से उतरने से पहले सभी पत्रकार गाड़ी को घेरते..। शीशे से झांक कर..भीतर देखते । कमज़ोर ..छोटा मोटा नेता होता..तो गरियाते हुए नारेबाज़ी करते रहते..। और अगर कोई बड़ा नेता निकल आता ..तो .... ' हें हें हें....कैसे हैं सर आsssप..! देखिये ना हम लोगों को बाहर रोक कर रक्खे हुए हैं..। आप ऐसा करिये...हमारी ओर आजाइये..हें हें हें हेंssss....! नेताओं की शक्ल बदल रही थी.., और क्रांतिकारी पत्रकारों के सुर..। आखिर सीएम की गाड़ी आ पहुंची..। सब चिल्लाए...रोको रोको रोको..। मत जाने दो भीतर..। गाड़ी के रुकते ही...महिला पत्रकार लपक कर गाड़ी के दरवाज़े पर पहुंची...और झटके से दरवाज़ा खोल दिया..। पिछले एक घन्टे से वो इतने गुस्से में थी..कि मुझे समझ नहीं आरहा था..कि आगे क्या होने वाला है..। शायद वो सीएम को घसीट कर बाहर खींचने वाली थी....या फिर शायद...सीएम के मुंह पर बुलंद आवाज़ में नारा लगाने वाली थी.., या शायद..साथियों के साथ उनका घेराव करके उन्हें भीतर जाने से रोकने वाली थी..। पल भर में ही मेरे मन ना जाने कितनी कल्पनाएं कर डालीं..। मगर अगले ही पल...वो महिला पत्रकार..मुझे मुख्यमंत्री के सामने हाथ बांधे खड़ी दिखाई दी.............
अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ..। भला इतनी जल्दी..कोई कैसे रंग बदल सकता है..। ' आइये मैम...कैसी हैं आप?' आवाज़ में मानो मिश्री सी घुल गई थी..। और फिर वो खुद ...रानी को राजभवन के दरवाज़े तक छोड़ आई...!
सबके सामने बिल्कुल सामान्य खड़ी थी वो महिला पत्रकार । उसे ना इस बात से फर्क पड़ा..कि सब उसे देख रहे थे । और ना इस बात का कोई अफसोस था..कि उसने अपने आप को खो दिया है..। वैसे ...वहां मौजूद किसी भी शख्स को..उसकी हरकत से वाकई फर्क नहीं पड़ा..। वो सब भी अपनी अपनी पसंद ने नेताओं आगे खीसें निपोर रहे थे..। इसने में एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने 'सूत्रों' से बात कर के सभी पत्रकारों के प्रवेश पर लगी रोक हटवा दी..। और सभी पत्रकार..एक एक कर..भीतर जाने लगे..। थोड़ी देर पहले तक..जिस सिक्योरिटी वाले को वो महिला पत्रकार गालियां निकाल रही थी.., वही सिक्योरिटी वाला..उससे कह रहा था..'अरे मैडम आपके आई कार्ड की ज़रूरत नहीं है..। आपको तो हम जानते हैं......'
कहने के लिये बहुत कुछ है मन में..। मगर क्या लिखूं...यहां कुछ समझ में नहीं आरहा है..। बस एक गीत गूंज रहा है कानों में....
वाह री दुनिया...
" ऐ करवट ले सोई हक़ीकत की दुनिया...ओ दुनिया...
दीवानी होती तबीयत की दुनिया..ओ दुनिया..
ख्वाहिश में लिपटी ज़रूरत की दुनिया..ओ दुनिया रे...
है इंसां के सपनों के नीयत की दुनिया...ओ दुनिया...
ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया... "
सब भाई लोग सुन लो..बायकॉट करना है टोटल..।
ना कोई खबर छापेगा..ना कोई टीवी पर चलाएगा '.....
....पत्रकार बुरी तरह भड़के हुए थे..। दिल्ली के राज्यपाल के घर के बाहर हंगामा हो रहा था..। शीला की कैबिनेट में फेरबदल होना था.., और प्रेस को भीतर आने से मना कर दिया गया..। 'अरे चोरों की तरह छिपते क्या हो..?' एक महिला पत्रकार चिल्लाई..' सामने आकर बात क्यों नहीं करते..?' अगर कोई गड़बड़ नहीं है.., तो मीडिया से चेहरा छिपाने की क्या ज़रूरत है..? ' 'अरे भाई सब कान खोल कर सुन लो...आज किसी भी नेता की गाड़ी भीतर नहीं जाएगी..। सबको दरवाज़े पर रोका जाएगाsssss...'
ऐसा महसूस हो रहा था..आज़ादी की लड़ॉई छिड़ गई है..। और आज तो सब क्रांतिकारी पत्रकार मिल कर..देश को आज़ाद करवा कर मानेंगे..। इनमें एक महिला पत्रकार का जोश देखते ही बन रहा था..। शब्दों से अपने सभी साथियों को झकझोर कर रख दिया था उसने..। मन ही मन मैं उससे इम्प्रेस भी हो रही थी..। बस...अकड़ के मारे अपने भाव व्यक्त नहीं होने दे रही थी..
एक-एक कर नेताओं की गाड़ियां पहुंचने लगीं..। नेता जी के गाड़ी से उतरने से पहले सभी पत्रकार गाड़ी को घेरते..। शीशे से झांक कर..भीतर देखते । कमज़ोर ..छोटा मोटा नेता होता..तो गरियाते हुए नारेबाज़ी करते रहते..। और अगर कोई बड़ा नेता निकल आता ..तो .... ' हें हें हें....कैसे हैं सर आsssप..! देखिये ना हम लोगों को बाहर रोक कर रक्खे हुए हैं..। आप ऐसा करिये...हमारी ओर आजाइये..हें हें हें हेंssss....! नेताओं की शक्ल बदल रही थी.., और क्रांतिकारी पत्रकारों के सुर..। आखिर सीएम की गाड़ी आ पहुंची..। सब चिल्लाए...रोको रोको रोको..। मत जाने दो भीतर..। गाड़ी के रुकते ही...महिला पत्रकार लपक कर गाड़ी के दरवाज़े पर पहुंची...और झटके से दरवाज़ा खोल दिया..। पिछले एक घन्टे से वो इतने गुस्से में थी..कि मुझे समझ नहीं आरहा था..कि आगे क्या होने वाला है..। शायद वो सीएम को घसीट कर बाहर खींचने वाली थी....या फिर शायद...सीएम के मुंह पर बुलंद आवाज़ में नारा लगाने वाली थी.., या शायद..साथियों के साथ उनका घेराव करके उन्हें भीतर जाने से रोकने वाली थी..। पल भर में ही मेरे मन ना जाने कितनी कल्पनाएं कर डालीं..। मगर अगले ही पल...वो महिला पत्रकार..मुझे मुख्यमंत्री के सामने हाथ बांधे खड़ी दिखाई दी.............
अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ..। भला इतनी जल्दी..कोई कैसे रंग बदल सकता है..। ' आइये मैम...कैसी हैं आप?' आवाज़ में मानो मिश्री सी घुल गई थी..। और फिर वो खुद ...रानी को राजभवन के दरवाज़े तक छोड़ आई...!
सबके सामने बिल्कुल सामान्य खड़ी थी वो महिला पत्रकार । उसे ना इस बात से फर्क पड़ा..कि सब उसे देख रहे थे । और ना इस बात का कोई अफसोस था..कि उसने अपने आप को खो दिया है..। वैसे ...वहां मौजूद किसी भी शख्स को..उसकी हरकत से वाकई फर्क नहीं पड़ा..। वो सब भी अपनी अपनी पसंद ने नेताओं आगे खीसें निपोर रहे थे..। इसने में एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने 'सूत्रों' से बात कर के सभी पत्रकारों के प्रवेश पर लगी रोक हटवा दी..। और सभी पत्रकार..एक एक कर..भीतर जाने लगे..। थोड़ी देर पहले तक..जिस सिक्योरिटी वाले को वो महिला पत्रकार गालियां निकाल रही थी.., वही सिक्योरिटी वाला..उससे कह रहा था..'अरे मैडम आपके आई कार्ड की ज़रूरत नहीं है..। आपको तो हम जानते हैं......'
कहने के लिये बहुत कुछ है मन में..। मगर क्या लिखूं...यहां कुछ समझ में नहीं आरहा है..। बस एक गीत गूंज रहा है कानों में....
वाह री दुनिया...
" ऐ करवट ले सोई हक़ीकत की दुनिया...ओ दुनिया...
दीवानी होती तबीयत की दुनिया..ओ दुनिया..
ख्वाहिश में लिपटी ज़रूरत की दुनिया..ओ दुनिया रे...
है इंसां के सपनों के नीयत की दुनिया...ओ दुनिया...
ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया..ओ री दुनिया... "
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