आज पता नहीं क्यों रात भर नींद नहीं आई। रात भर चैनल बदलती रही..कभी फेस बुक के पन्ने पलटती रही..। अभी अभी घड़ी देखी - अरे बाप रे.., सुबह तो हो भी गई..!! चिड़ियों के चहकने की आवाज़ आरही है। मेरे घर में खिड़की नहीं है..वरना उन्हें देख भी पाती। यहां तो सांसें..जैसे एसी की गुलाम हैं।
रोज़ सुबह, मैं अपने शहर को मिस करती हूं। वहां सूरज उगता है, तो आसमान सुनहरे लाल रंग का दिखता है। जब स्कूल में पढ़ती थी..,तो छत पर लहराते आते पेड़ों के पत्तों से, अक्सर बातें किया करती थी। सफेदे के तने को थाम कर, बायोलॉजी के चैप्टर्स का रट्टा लगाया है मैंने..। अब तो वो पेड़ भी नहीं रहा। पर छत से सूरज अब भी वैसा ही दिखता होगा..। अब के घर जाऊंगी..तो मिलूंगी उससे..।
बड़े तालाब की मछलियां भी मुझे याद करती होंगी..। कई सालों से उन्हें आटा नहीं खिलाया..।मां-पापा के आगे आगे..छोटे भाई की उंगली पकड़ कर किनारे-किनारे चलते वक्त, उससे अक्सर झगड़ा हो जाता था..। अब भी हम अक्सर झगड़ते हैं..। पर अब हम अक्सर फोन पर लड़ते हैं..। एक ही शहर में रहते हैं..फिर भी हफ्तों मिल नहीं पाते..। दोनों की नौकरियां ही ऐसी हैं..। इस दिल्ली शहर का दर्द ही यही है..। यहां सब कुछ मिलता है..। बस..वक्त ही नहीं मिलता..। मेरे शहर में ऐसा नहीं होता..। सुबह के नाश्ते पर ना सही, रात के खाने पर सब एक साथ ज़रूर होते हैं..। ढेर सारी बातें करते हैं..और सपने भी एक साथ देखते हैं..।
मेरे सबसे पुराने स्कूल में, अब टीचर्स भी नए आगए हैं..। पुराने टीचर्स सब रिटायर हो गए हैं..। पता नहीं क्यूं..आज यहां बैठे..प्रार्थना के पहले की घंटी याद आरही है मुझे..। आहूजा दीदी की क्लास में- रोल नम्बर ग्यारह..- उपस्थित हूं दीदी..!!...,,, अब के घर जाऊंगी..तो स्कूल का एक चक्कर काट के आऊंगी मैं..। प्ले ग्राउंड में वो छोटा सा फव्वारा..शायद अब भी होगा..।
कहते हैं, सरस्वती मेरे शहर के नीचे-नीचे बहती है..। बहुत बड़ा तीर्थ है ये। यहां कृष्ण ने विराट स्वरूप प्रकट किया था, गीता रच डाली थी..। जब से शहर छूटा है, गीता के श्लोक भी छूट से गए हैं..। स्टडी रूम की बुक शेल्फ पर कहीं रखी होगी मेरी गीता..। अब के घर जाऊंगी..तो उठा लाऊंगी उसे भी..।
पता नहीं क्यों ये सब कुछ कहती जा रही हूं..। नौकरी के लिये घर से दूर रहने वाली, मैं अकेली तो नहीं हूं..। मेरी तरह करोड़ों लड़के ल़डकियां, करियर के लिये , छोटे शहरों से निकल कर, बड़े शहरों का रुख करते हैं। शायद..सभी अपने शहर को, मेरी ही तरह मिस करते हैं..।
सुबह की पूजा का समय हो गया है..। मां का फोन भी आता ही होगा..। ये जानने के लिये..कि कहीं मैं अब तक सो तो नहीं रही हूं..।
रोज़ सुबह, मैं अपने शहर को मिस करती हूं। वहां सूरज उगता है, तो आसमान सुनहरे लाल रंग का दिखता है। जब स्कूल में पढ़ती थी..,तो छत पर लहराते आते पेड़ों के पत्तों से, अक्सर बातें किया करती थी। सफेदे के तने को थाम कर, बायोलॉजी के चैप्टर्स का रट्टा लगाया है मैंने..। अब तो वो पेड़ भी नहीं रहा। पर छत से सूरज अब भी वैसा ही दिखता होगा..। अब के घर जाऊंगी..तो मिलूंगी उससे..।
बड़े तालाब की मछलियां भी मुझे याद करती होंगी..। कई सालों से उन्हें आटा नहीं खिलाया..।मां-पापा के आगे आगे..छोटे भाई की उंगली पकड़ कर किनारे-किनारे चलते वक्त, उससे अक्सर झगड़ा हो जाता था..। अब भी हम अक्सर झगड़ते हैं..। पर अब हम अक्सर फोन पर लड़ते हैं..। एक ही शहर में रहते हैं..फिर भी हफ्तों मिल नहीं पाते..। दोनों की नौकरियां ही ऐसी हैं..। इस दिल्ली शहर का दर्द ही यही है..। यहां सब कुछ मिलता है..। बस..वक्त ही नहीं मिलता..। मेरे शहर में ऐसा नहीं होता..। सुबह के नाश्ते पर ना सही, रात के खाने पर सब एक साथ ज़रूर होते हैं..। ढेर सारी बातें करते हैं..और सपने भी एक साथ देखते हैं..।
मेरे सबसे पुराने स्कूल में, अब टीचर्स भी नए आगए हैं..। पुराने टीचर्स सब रिटायर हो गए हैं..। पता नहीं क्यूं..आज यहां बैठे..प्रार्थना के पहले की घंटी याद आरही है मुझे..। आहूजा दीदी की क्लास में- रोल नम्बर ग्यारह..- उपस्थित हूं दीदी..!!...,,, अब के घर जाऊंगी..तो स्कूल का एक चक्कर काट के आऊंगी मैं..। प्ले ग्राउंड में वो छोटा सा फव्वारा..शायद अब भी होगा..।
कहते हैं, सरस्वती मेरे शहर के नीचे-नीचे बहती है..। बहुत बड़ा तीर्थ है ये। यहां कृष्ण ने विराट स्वरूप प्रकट किया था, गीता रच डाली थी..। जब से शहर छूटा है, गीता के श्लोक भी छूट से गए हैं..। स्टडी रूम की बुक शेल्फ पर कहीं रखी होगी मेरी गीता..। अब के घर जाऊंगी..तो उठा लाऊंगी उसे भी..।
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| Brahmsarovar, Kurukshetra |
सुबह की पूजा का समय हो गया है..। मां का फोन भी आता ही होगा..। ये जानने के लिये..कि कहीं मैं अब तक सो तो नहीं रही हूं..।

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