'भैया जी.., कितने रुपए दूं ? '- मैंने पूछा।
'300 रुपए मैम'- गैस वाले ने कहा..
'अरे ये छोटा सिलेंडर है..पौने चार किलो का'- बीच में मेरी कामवाली बाई बोली..- 'बड़ा तो और महंगा है दीदी। पता नहीं सरकार क्या चाहती है...' ।
आम आदमी के इस सीधे स्पष्ट सवाल का जवाब नहीं है सरकार के पास..। विप्रो के अज़ीम प्रेमजी कहते हैं -'देश बिना नेताओं के चल रहा है..।' इनफोसिस के नारायणमूर्ति ने देश की खराब होती छवि पर चिंता ज़ाहिर की है..। देश के नामी उद्योगपतियों का इस तरह सरकार पर भड़कना, चिंता की बात तो है..।


लेकिन सरकार इस पर कुछ खास तवज्जो नहीं देती..। मणिशंकर अय्यर ज़रूर पलटवार करते हैं, और कहते हैं कि..अच्छे आर्थिक विकास के दिनों में यही उद्योगपति, सरकार का गुणगान किया करते थे..। विपक्ष की ओर से भी एक ही टिप्पणी आती है, वो भी पत्रकारों के सवाल करने पर..। अरे भाई..देश के लिये न सही, राजनीति के लिये ही सही, इस पर विपक्ष, सरकार का घेराव कर ही सकता था..। लेकिन नहीं..., घिसी पिटी लाइन कह कर शाहनवाज़ हुसैन साहब चलते बने..' सरकार आर्थिक मंदी से जूझ नहीं पा रही है'..। अरे तो विपक्ष क्यों सोया पड़ा है भाई..!!, सरकार को झकझोरता क्यों नहीं..? सच्चाई तो ये है..कि आर्थिक मंदी से कम, ये देश राजनैतिक मंदी से ज़्यादा जूझ रहा है..। शरद यादव के पास पत्रकार पहुंचे..तो वो बोले..कि ' कोई भी अर्थशास्त्री,स्पष्ट राजनैतिक दिशानिर्देश के बिना, अपना काम ठीक से कर ही नहीं सकता..'- इशारा अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की ओर था..।
18 जून को रिज़र्व बैंक 2012-13 में मौद्रिक नीति पर पहली तिमाही की समीक्षा पेश करने वाला है..। इस वक्त कच्चे तेल की कीमत, पिछले आठ महिनों में सबसे कम, 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे है..। लिहाज़ा बाज़ार को रिज़र्व बैंक से, कुछ रियायतों की आशा है..। पर क्या उतना ही काफी होगा..? ये भी सही है, कि भारत को आस पास की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं के हालात से पूरी तरह अछूता रखना भी मुमकिन नहीं है..। तो क्या, दुनिया भर में कई अर्थव्यवस्थाएं जिस संकट से जूझ रही हैं, उसकी लहरों को भारत की नैया डगमगाने की इजाज़त दे दें..? 18 जून को ही, जी-20 देशों का सातवां शिखर सम्मेलन शुरू हो रहा है..। लास काबोस में सभी सदस्य देशों के नेता मिलेंगे..। इस बार की चर्चा, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों से लड़ने पर होगी..। फरवरी की बैठक पर भी यूरो संकट ही छाया रहा था..। और नवंबर में कान में हुए सम्मेलन में भी मुद्दा यही था..। इस बार की चर्चा से क्या निकल कर आएगा, उसका भी इंतज़ार करना होगा..। पर ये भारी भरकम पर्दा लेकर भी, सरकार उन सवालों से नज़रें नहीं चुरा सकती, जो हर रोज, हर आम आदमी पूछता है.., ये जानते हुए भी, कि इन सवालों का जवाब, उसे कभी नहीं मिलने वाला..।
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