'बल्ले-बल्ले..बारात आई..आग गी बराssत'..
पापा का हाथ थामे उस ढाई-तीन साल की बच्ची ने मेरे साथ दो तीन सवारियों का ध्यान खींचा..। बस की खिड़की से देखा उसे..। पापा की उंगली थामे..गली से बाहर निकली थी उसी वक्त..। मेन रोड से जुड़ी दिल्ली की एक संकरी सी गली..। किसी शादी में शायद उस बच्ची ने बारातियों से भरी बस देखी होगी..। सड़क पर बस देख कर समझ बैठी..उसमें बारात है..। जितने में उसके पापा ने उसे टोका..उसकी नज़र मुझ पर पड़ चुकी थी..। मुझे मुस्कुराते देख..उसके चेहरे पर झेंप भरी मायूसी फैल गई..।
कुछ पल में बस भी उस मोड़ से आगे निकल गई..। ध्यान टूटा..एक पुराने गाने की आवाज़ से..। ' इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए..कोई यहां गिरा..कोई वहां गिरा..'। आवाज़ दूसरी ओर की कतार से आरही थी..। एक लड़के के मोबाइल में ये गाना बज रहा था..। बस में खास भीड़ नहीं थी..। लड़के के मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से गाने बज रहे थे..। सब के सब पुराने..और सैड सॉन्ग..। एक के पीछे एक..। ' रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं...'- मोबाइल पर अगला गाना बजा..। उन मायूस गीतों में खोया वो लड़का, चुपचाप..उदास सी शक्ल लिये..खिड़की से बाहर देखे जा रहा था..। क्या पता..किसका चेहरा दिखाई दे रहा था उसे खिड़की के उस पार..।
कश्मीरी गेट से दूसरी बस ली..। मरे स्टॉप तक छोड़ती है..। एक सीट खाली थी..लेकिन बगल में एक बुज़ुर्ग अंकल खड़े थे..। 'आप बैठ जाइये'- मैंने कहा उनसे..। लेकिन उन्हें बैठना नहीं था..। मुझे लगा..कोई और ये सीट लेले, इससे बेहतर है..मैं ही बैठ जाऊं..। अगले स्टॉप से एक और बुज़ुर्ग उसी बस में चढ़े..। वो पहले वाले अंकल को जानते थे..। दोनों मेरी बगल ही में खड़े बातें कर रहे थे..। पहले वाले अंकल ने कहा..अभी मेरे शरीर में कोई तकलीफ नहीं है, एक घन्टे तक खड़े हो कर सफर कर सकता हूं..। दूसरे वाले अंकल मस्कुराए.., कुछ बोले नहीं..। पहले वाले अंकल ने फिर कहा- 'बच्चे पता नहीं क्या समझते हैं..। उन्हें लगता है..मैं कुछ नहीं कर सकता अब..। मेरे बाप बनते हैं बेटे अब..।' अंकल की बातों में छटपटाहट थी,, और चेहरे पर गुस्सा..और अजीब सी मायूसी..।
उस बच्ची, लड़के और बुज़ुर्ग अंकल में क्या फर्क था..? ज़िन्दगियां अलग..उम्र अलग..। चाहतें..और मायूसियां भी अलग-अलग..। लेकिन ये तीनों ही, ज़िन्दगी की उसी बस से जुड़े थे..। बच्ची को अपना सफर अभी शुरू करना था, वो लड़का बीच सफर में था, और बुज़ुर्ग अंकल, खड़े-खड़े अपने स्टॉप का इंतज़ार कर रहे थे..। मेरा भी स्टॉप आ चुका था..। यहां से आगे..घर तक पैदल ही जाती हूं..।
पापा का हाथ थामे उस ढाई-तीन साल की बच्ची ने मेरे साथ दो तीन सवारियों का ध्यान खींचा..। बस की खिड़की से देखा उसे..। पापा की उंगली थामे..गली से बाहर निकली थी उसी वक्त..। मेन रोड से जुड़ी दिल्ली की एक संकरी सी गली..। किसी शादी में शायद उस बच्ची ने बारातियों से भरी बस देखी होगी..। सड़क पर बस देख कर समझ बैठी..उसमें बारात है..। जितने में उसके पापा ने उसे टोका..उसकी नज़र मुझ पर पड़ चुकी थी..। मुझे मुस्कुराते देख..उसके चेहरे पर झेंप भरी मायूसी फैल गई..।
कुछ पल में बस भी उस मोड़ से आगे निकल गई..। ध्यान टूटा..एक पुराने गाने की आवाज़ से..। ' इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए..कोई यहां गिरा..कोई वहां गिरा..'। आवाज़ दूसरी ओर की कतार से आरही थी..। एक लड़के के मोबाइल में ये गाना बज रहा था..। बस में खास भीड़ नहीं थी..। लड़के के मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से गाने बज रहे थे..। सब के सब पुराने..और सैड सॉन्ग..। एक के पीछे एक..। ' रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं...'- मोबाइल पर अगला गाना बजा..। उन मायूस गीतों में खोया वो लड़का, चुपचाप..उदास सी शक्ल लिये..खिड़की से बाहर देखे जा रहा था..। क्या पता..किसका चेहरा दिखाई दे रहा था उसे खिड़की के उस पार..।
कश्मीरी गेट से दूसरी बस ली..। मरे स्टॉप तक छोड़ती है..। एक सीट खाली थी..लेकिन बगल में एक बुज़ुर्ग अंकल खड़े थे..। 'आप बैठ जाइये'- मैंने कहा उनसे..। लेकिन उन्हें बैठना नहीं था..। मुझे लगा..कोई और ये सीट लेले, इससे बेहतर है..मैं ही बैठ जाऊं..। अगले स्टॉप से एक और बुज़ुर्ग उसी बस में चढ़े..। वो पहले वाले अंकल को जानते थे..। दोनों मेरी बगल ही में खड़े बातें कर रहे थे..। पहले वाले अंकल ने कहा..अभी मेरे शरीर में कोई तकलीफ नहीं है, एक घन्टे तक खड़े हो कर सफर कर सकता हूं..। दूसरे वाले अंकल मस्कुराए.., कुछ बोले नहीं..। पहले वाले अंकल ने फिर कहा- 'बच्चे पता नहीं क्या समझते हैं..। उन्हें लगता है..मैं कुछ नहीं कर सकता अब..। मेरे बाप बनते हैं बेटे अब..।' अंकल की बातों में छटपटाहट थी,, और चेहरे पर गुस्सा..और अजीब सी मायूसी..।
उस बच्ची, लड़के और बुज़ुर्ग अंकल में क्या फर्क था..? ज़िन्दगियां अलग..उम्र अलग..। चाहतें..और मायूसियां भी अलग-अलग..। लेकिन ये तीनों ही, ज़िन्दगी की उसी बस से जुड़े थे..। बच्ची को अपना सफर अभी शुरू करना था, वो लड़का बीच सफर में था, और बुज़ुर्ग अंकल, खड़े-खड़े अपने स्टॉप का इंतज़ार कर रहे थे..। मेरा भी स्टॉप आ चुका था..। यहां से आगे..घर तक पैदल ही जाती हूं..।
No comments:
Post a Comment