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Thursday, February 10, 2011

नेता जी का भोज....

            'अरे यार..चमचे खतम हो गए हैं..'। नेता जी के भोज में बुफे टेबल के पास से आवाज़ सुनाई पड़ी, तो खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं सकी। 'मैडम आपने खाना खाया..?' हाथ जोड़ कर..बड़ी नम्रता से नेता जी ने मुझसे सवाल किया। दिल्ली दरबार के आंगन में नेता जी ने नए साल का भोज रखा था। रानी समेत..सारे दरबारी आमंत्रित थे। पत्रकारों को भी न्यौता मिला था। यहां दिल्ली के वो सारे 'खास' लोग मौजूद थे, जो अपने माथे पर 'आम आदमी' लिख कर घूमते हैं। रेमन्ड्स की शर्ट पर, खादी जैकेट वाले नेता भी, और डिज़ाइनर घड़ी पहन कर वक्त बदलने की बातें करने वाले पत्रकार भी..। 
              ऐसे माहौल से परिचय का मेरा ये पहला मौका था। कुछ देर लगी समझने में..। मगर फिर , सब कुछ साफ-दिखाई देने लगा। अलग-अलग टेबलों पर, अलग-अलग किस्म की चर्चाएं थीं..। 'और भाई..क्या हाल चाल हैं..?' 'अरे आपसे क्या छिपा है..ही ही ही।' 'आती गर्मी में पानी की समस्या पर भी सवाल कर लेना' 'अपनी आईडी भी लगा दो यार बीच में..!' 'भई नेता जी..आपने काम नहीं करवाया मेरा..' वगैरह वगैरह..। 
             बड़ी-बड़ी गम्भीर बातों को हंस कर टाल देने वाले लोग, हंसी-हंसी में बड़ी गम्भीर बातें कर रहे थे..। पता नहीं इनमें से देश के काम क्या आने वाला था। मगर वहां मौजूद हर शख्स, अपना कोई ना कोई काम बनाने के जुगाड़ में था। जिनके सम्बन्ध विशेष थे, वो सीना तान कर फेवर ले रहे थे। और जिनके ताल्लुक भोज तक सीमित थे, वो सीढ़ियां बना रहे थे। 
             मुस्कुरा सब रहे थे। और हर मुस्कुराहट का अलग मतलब था। तेज़ धूप में सफेद इमारत भी चमक रही थी। और वहां मौजूद ज़्यादातर लोगों के चेहरे भी साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। अगर कुछ नहीं दिखाई दे रहा था..तो वो था.. आम आदमी। जिसका नाम .. किसी के निमन्त्रण की लिस्ट में नहीं होता। 
             
             
             
             


2 comments:

  1. भोज... जीहां.. भोज ही है हमारा देश.. सब खा रहे हैं बेशर्मी से.. कहीं जंगली भैंसा बनकर.. कहीं लोमड़ी बनकर.. कहीं गिद्ध बनकर.. कुछ तो ऐसे भी हैं.. जो बन्दर बनकर खाने से भी एतराज नहीं रखते..। तो ऐसे में भूखा सोना तो आमआदमी की नियति ही है.. खुद ही ना निवाला बनजाए किसी का इसलिए.. छिपा रह ऐ आम आदमी...

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  2. @ Jayant.... सही कहा आपने..। भूख..और मौत, बस यही इस संसार के शाश्वत सत्य हैं..। जो भूखे हैं.., वो दरअसल इतने भूखे हैं.., मानो अगले कई जन्मों तक आगे कुछ मिलने वाला ही नहीं है। इसीलिये दिन रात बस खाने में लगे रहते हैं..। फिर भी इनका पेट नहीं भरता..। बाकि बचे वे लोग.., जिनका होना न होना, किसी के लिये मायने नहीं रखता..। वो जियें या मरें..किसी को क्या फर्क पड़ता है..?

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